गीता उपदेश: भगवान श्रीकृष्ण के वो 5 महामंत्र, जो आपको कभी जीवन में हार नहीं मानने देंगे
गीता का ज्ञान सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं है, बल्कि इसे जीवन में उतारना भी जरूरी है। भगवत गीता की ...और पढ़ें
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भगवान श्रीकृष्ण के 5 गीता महामंत्र

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। कुरुक्षेत्र की रणभूमि में जब अर्जुन हताश और निराश हो गए थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जो ज्ञान दिया, वह केवल महाभारत काल के लिए ही नहीं बल्कि आज के इस 'कलियुग' में भी प्रासंगिक बना हुआ है। श्रीमद्भगवद्गीता के ये 6 श्लोक हमें सिखाते हैं कि विपरीत परिस्थितियों में भी कैसे मजबूत रहा जाए और जीवन में कभी हार न मानी जाए।
कर्म पर नियंत्रण, परिणाम पर नहीं
1. श्लोक: - कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।
अर्थ: आपका अधिकार केवल अपने कर्म करने पर है, उसके फल पर कभी नहीं। इसलिए परिणाम की चिंता किए बिना अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दें। जो लोग केवल अपने काम को पूरी ईमानदारी से करते हैं और उसस मिलने वाले रिजल्ट की चिंता नहीं करते, वे कभी असफलता के डर से हार नहीं मानते।
संयम से मिलती है परम शांति
2 श्लोक: - श्रद्धावान्ल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।।
अर्थ: जिस व्यक्ति के मन में अटूट श्रद्धा यानी विश्वास है और जो अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखना जानता है, वही सच्चा ज्ञान प्राप्त करता है। ऐसा ज्ञान मिलते ही मनुष्य को परम शांति का अनुभव होता है। यह श्लोक हमें सीखाता है कि अपने काम पर फोकस और सेल्फ-कंट्रोल ही आपको भीड़ से अलग और विजयी बनाता है।
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जैसी सोच, वैसा व्यक्तित्व
3. श्लोक: - सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः।।
अर्थ: यह श्लोक कहता है कि हर इंसान का विश्वास उसकी प्रकृति के अनुरूप होता है। मनुष्य अपने विचारों और आस्था से ही निर्मित होता है। सरल शब्दों में कहें, तो आप जैसा विश्वास खुद पर करेंगे, वैसे ही आप बन जाएंगे। किसी भी काम से पहले हार और जीत पहले ही हमारे दिमाग में तय होती है। अगर आपकी सोच सकारात्मक है और आप खुद पर भरोसा रखते हैं, तो कोई भी परिस्थितियां आपको तोड़ नहीं सकती।
चिंता का त्याग ही सुख की कुंजी
4. श्लोक: - चिन्तया जायते दुःखं नान्यथेहेति निश्चयी।
तया हीनः सुखी शान्तः सर्वत्र गलितस्पृहः।।
अर्थ: इस संसार में चिंता ही सारे दुखों का एकमात्र मूल कारण है। जो व्यक्ति इस सच को स्वीकार कर लेता है, वह मानसिक तनाव से मुक्त होकर एक सुखी, शांत और संतोषी जीवन जीता है। सरल शब्दों में 'ओवरथिंकिंग' या भविष्य की व्यर्थ चिंता में एनर्जी को नष्ट न करें। वर्तमान में जिएं और अपनी ऊर्जा को सही दिशा में लगाएं।
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(Picture Credit- AI Generated)
सुख-दुख की क्षणिक प्रकृति को समझें
5. श्लोक: - मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।
अर्थ: इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे कुंतीपुत्र! (अर्जुन) मौसम में जैसे सर्दी और गर्मी आती-जाती रहती है, ठीक वैसे ही जीवन में सुख और दुख का आना-जाना तय है। ये स्थायी नहीं हैं, इसलिए विचलित हुए बिना इन्हें धैर्यपूर्वक सहना सीखें। अर्थात बुरा वक्त हमेशा के लिए नहीं ठहरता। जो लोग मुश्किल समय में धैर्य नहीं खोते, वही अंततः विजय होते हैं।
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