क्या बेटी मृत पिता को मुखाग्नि दे सकती है? गरुड़ पुराण में लिखी बात का रहस्य
हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार के नियमों पर आधारित यह लेख बताता है कि पुत्र न होने पर क्या बेटी पिता को मुखाग्नि दे सकती है। गरुड़ पुराण और मार्कंडेय पु ...और पढ़ें

गरुड़ पुराण का रहस्य: क्या बेटी दे सकती है पिता को मुखाग्नि (Picture Credit: AI Generated)
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पुत्र न होने पर स्त्रियां कर सकती हैं अंतिम संस्कार।
पत्नी की अनुपस्थिति में बेटियां दे सकती हैं मुखाग्नि।
पुराणों में स्त्री-पुरुष को समान अधिकार प्राप्त हैं।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू संस्कृति में 16 संस्कारों को सबसे प्रमुख माना जाता है और इनमें से सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है अंतिम संस्कार। मृतक व्यक्ति का अंतिम संस्कार करने के कुछ विशेष नियम बनाए गए हैं और उनका पालन जरूरी माना जाता है, जिससे मृतक की आत्मा को मोक्ष मिल सकता है।
अंतिम संस्कार की प्रक्रिया में मृत व्यक्ति को चिटा में रखकर मुखाग्नि दी जाती है और अर्थी को जलाया जाता है। इस प्रक्रिया को ही अंतिम संस्कार कहा जाता है। ऐसे में एक सवाल मन में आता है कि यदि किसी व्यक्ति का कोई पुत्र नहीं है तो क्या पिता की चिता को बेटी मुखाग्नि दे सकती है? आइए आपको बताते हैं गरुड़ पुराण में इसके लिए कौन से नियम बनाए गए हैं।
कौन कर सकता है अंतिम संस्कार
अंतिम संस्कार के नियमों में गरुड़ पुराण में कुछ बातें बताई गई हैं और उनका पालन करने से ही मृतक की आत्मा को मोक्ष मिल सकता है। इस पुराण के अनुसार यदि व्यक्ति का पुत्र या पोता न हो, तो स्त्रियां अंतिम संस्कार कर सकती हैं और ऐसा करना शास्त्रों के अनुरूप माना जाता है।
आमतौर पर स्त्रियों को अंतिम संस्कार में शामिल होने से मना इसलिए किया जाता है क्योंकि वो दिल से कोमल होती हैं और इस घटना का उनके मन में गहरा असर हो सकता है, इसलिए मुख्य रूप से स्त्रियां श्मशान घाट में नहीं जाती हैं।
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क्या कहता है मार्कंडेय पुराण
यदि किसी व्यक्ति की चिता को मुखाग्नि देने की बात की जाती है तो सबसे पहले उस व्यक्ति का सबसे बड़ा पुत्र इस कर्म को निभाता है। यदि पुत्र नहीं है तो पत्नी का पहला अधिकार है कि वो अपने पति की चिता को मुखाग्नि दे सके।
पुराणों के अनुसार मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार के समय बिना किसी भी तरह का लिंग भेद किए बिना भक्ति और श्रद्धा के साथ अंतिम संस्कार का कार्य करना चाहिए, जिससे मृतक की आत्मा को संतुष्टि मिले।
गरुड़ पुराण में कही गई है ये बात
गरुड़ पुराण के प्रेत कांड के आठवें अध्याय में इस बात का वर्णन मिलता है कि यदि घर में पुत्र मौजूद न हो तो पत्नी या पोता कोई भी व्यक्ति के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया को निभा सकता है।
पुत्र की अनुपस्थिति में पहला अधिकार पत्नी का माना जाता है। यही नहीं मार्कण्डेय पुराण में स्वयं भगवान विष्णु ने कहा है कि यदि किसी व्यक्ति का पुत्र और पत्नी दोनों नहीं हैं तो बेटियां अपने पिता को मुखाग्नि दे सकती हैं और अंतिम संस्कार के साथ श्राद्ध कर्म में ही पूरी तरह से हिस्सा ले सकती हैं।
वास्तव में पुराणों में भी स्त्री और पुरुष को बराबरी का सम्मान दिया गया है और किसी भी संस्कार में पूर्ण रूप से शामिल होने की अनुमति प्राप्त है।
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