गुस्से में करते हैं अपना ही नुकसान? चाणक्य नीति में छिपा है 'शॉर्ट टेम्पर्ड' लोगों के लिए बड़ा रहस्य
आचार्य चाणक्य ने अपनी नीति में बताया है कि कोई व्यक्ति किस तरह अपनी भावनाओं पर कंट्रोल रख सकता है।

गुस्से पर काबू पाकर कैसे बनें सफल? (Picture Credit- AI Generated)
HighLights
गुस्से में तुरंत प्रतिक्रिया देने से बचें, शांत रहें
कार्य को निष्पक्षता से करें, मोह-लोभ से दूर रहें
जीवन में किसी भी चीज की अति हानिकारक है
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। आचार्य चाणक्य ने अपनी नीति में बताया है कि कोई व्यक्ति किस तरह अपनी भावनाओं पर कंट्रोल रख सकता है। आचार्य चाणक्य की नीतियों के अनुसार, व्यक्ति अपनी भावनाओं, विशेषकर क्रोध को नियंत्रित करना सीख जाए, तो वह जीवन में बहुत कुछ हासिल कर सकता है। चाणक्य की नीति धैर्य, निष्पक्ष कार्य और जीवन में अति से बचने के महत्व पर प्रकाश डालती है।
कब लेना चाहिए एक्शन?
अनुलोमेन बलिनं प्रतिलोमेन दुर्जनम्।
आत्मतुल्यबलं शत्रु: विनयेन बलेन वा।।
चाणक्य नीति से लिया गया यह श्लोक शत्रु या विपरीत परिस्थितियों को संभालने की कूटनीति सिखाता है। आचार्य चाणक्य कहते हैं कि गुस्से में व्यक्ति अपनी सोचने-समझने की शक्ति खो देता है। ऐसे में जो लोग आपको उकसाएं, उन पर तुरंत प्रतिक्रिया न दें और शांत रहें। अगर शत्रु या परिस्थितियां शक्तिशाली हों, तो धैर्य से काम लें और सही समय आने पर ही एक्शन लें।
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इसलिए खतरनाक है गुस्सा
क्रोधो वैवस्वतो राजा तृष्णा वैतरणी नदी।
विद्या कामदुधा धेनुः संतोषो नन्दनं वनम्॥
चाणक्य नीति का यह श्लोक बताता है कि क्रोध मनुष्य का किस तरह नाश करता है। चाणक्य ने क्रोध को यमराज के समान बताया है और तृष्णा यानी लालच को नरक की वैतरणी नदी के समान बताया है। वहीं विद्या सभी इच्छाओं को पूरी करने वाली कामधेनु है और संतोष स्वर्ग का नंदन वन है।
इस तरह करें कोई भी काम
न स्नेहात् कृत्वा विघ्नं न द्वेषात् न च लोभतः।
न मोहत् कार्यमत्यन्तं कार्यं कार्यवदाचरेत्॥
चाणक्य नीति का यह श्लोक कर्म और निष्पक्षता का सर्वोच्च सिद्धांत सिखाता है। इसमें कहा गया है कि किसी भी कार्य को न तो अत्यधिक स्नेह के कारण, न द्वेष के कारण, न लोभ के कारण और न ही मोह के कारण रोकना या बाधित करना चाहिए। कार्य को केवल उसके उचित तरीके से ही पूरा करना चाहिए।
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अति-संवेदनशीलता पर नियंत्रण
अतिरूपेण वै सीता, अतिगर्वेण रावण:।
अतिदानात् बलिर्बद्धो, ह्यति सर्वत्र वर्जयेत्॥
यह श्लोक हमें बताया है कि जीवन में किसी भी चीज की अत्यधिकता हानिकारक होती है। संतुलन ही जीवन की कुंजी है। आचार्य चाणक्य इस श्लोक में कहते हैं कि किसी भी चीज की अति बुरी होती है फिर चाहे वह रूप हो, अहंकार हो, या दान हो। भावनाओं का अत्यधिक प्रदर्शन भी व्यक्ति को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए, अपनी भावनाओं पर संतुलन रखना बहुत जरूरी है।
