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    Chandra Grahan 2026: वैज्ञानिक ही नहीं धार्मिक वजहों से भी खास है ये ग्रहण, ज्योतिष से जानें इससे जुड़े रहस्य

    Updated: Fri, 27 Feb 2026 04:30 PM (IST)

    ग्रहण के दौरान (Chandra Grahan 2026) बनने वाली प्रच्छाया और उपच्छाया के महत्व को आइए जानते हैं। ...और पढ़ें

    Chandra Grahan 2026: ग्रहण से जुड़े रहस्य। (Ai Generated Image)

    Chandra Grahan 2026: ग्रहण से जुड़े रहस्य। (Ai Generated Image)

    HighLights

    1. ग्रहण की अवधि बहुत महत्वपूर्ण होती है

    2. इस दौरान पूजा-पाठ और दान-पुण्य जरूर करना चाहिए

    3. धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से यह एक दुर्लभ समय होता है

    दिव्या गौतम, एस्ट्रोपत्री। विज्ञान और ज्योतिष की दुनिया में जब भी ग्रहण की बात होती है, तो प्रच्छाया और उपच्छाया जैसे शब्द बार-बार सामने आते हैं। सरल शब्दों में कहें तो जब प्रकाश के सामने कोई चीज आती है, तो उसकी दो तरह की परछाई बनती है। प्रच्छाया वह गहरा काला हिस्सा है जहां रोशनी बिल्कुल नहीं पहुंच पाती, जबकि उपच्छाया वह बाहरी धुंधला हिस्सा होता है जहां थोड़ी बहुत रोशनी पहुंचती रहती है। ज्योतिष के जानकारों के अनुसार, प्रच्छाया वाला समय ही मुख्य ग्रहण माना जाता है क्योंकि तब सूर्य या चंद्रमा की रोशनी पूरी तरह रुकने की आशंका होती है। यह केवल आकाश में घटने वाली घटना नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर हमारे मन और ऊर्जा के संचालन पर भी पड़ता है, इसलिए इसे आध्यात्मिक रूप से बहुत बड़ा माना गया है।

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    प्रच्छाया और उपच्छाया के बीच का अंतर

    प्रच्छाया और उपच्छाया के बीच के अंतर को समझना ग्रहण की तीव्रता को जानने के लिए जरूरी है। प्रच्छाया वह क्षेत्र है जहां से देखने पर प्रकाश का स्रोत पूरी तरह से ढका हुआ दिखाई देता है, जिससे वहां पूर्ण अंधेरा छा जाता है। इसके विपरीत, उपच्छाया क्षेत्र में प्रकाश का स्रोत केवल आंशिक रूप से ढका होता है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, जब चंद्रमा पृथ्वी की गहरी प्रच्छाया से गुजरता है, तभी उसे पूर्ण चंद्र ग्रहण माना जाता है। यदि चंद्रमा केवल उपच्छाया से होकर गुजरता है, तो उसे 'उपच्छाया चंद्र ग्रहण' कहते हैं। इसमें चंद्रमा की चमक थोड़ी धुंधली तो हो जाती है, लेकिन वह पूरी तरह काला नहीं पड़ता। 

    ग्रहण काल में प्रच्छाया पर ध्यान देना क्यों है जरूरी?

    धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से प्रच्छाया का विशेष महत्व है क्योंकि सूतक काल और अन्य नियम इसी पर आधारित होते हैं। शास्त्रों के अनुसार, जब ग्रहण प्रच्छाया में होता है और आंखों से स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, तभी उसके नियम और सूतक प्रभावी होते हैं। उपच्छाया ग्रहण को अक्सर पूर्ण ग्रहण की श्रेणी में नहीं रखा जाता, इसलिए उसमें सूतक के कड़े नियमों का पालन करना अनिवार्य नहीं माना जाता। हालांकि, प्रच्छाया के दौरान नकारात्मक ऊर्जा के बढ़ने की आशंका रहती है, इसलिए इस समय भोजन, निद्रा और मांगलिक कार्यों को टालने की सलाह दी जाती है।

    वैज्ञानिक रूप से भी प्रच्छाया के समय सूर्य को नग्न आंखों से देखना आंखों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। इसलिए प्रच्छाया के सटीक समय को जानकर ही अपनी दिनचर्या में बदलाव करना चाहिए।

    उपच्छाया ग्रहण और धार्मिक मान्यताओं का प्रभाव

    उपच्छाया ग्रहण के समय अक्सर लोगों के मन में यह संशय रहता है कि क्या उन्हें पूजा-पाठ या दान करना चाहिए। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, उपच्छाया ग्रहण में चंद्रमा का बिंब काला नहीं होता, केवल मटमैला दिखाई देता है। इस कारण से इसे ग्रहण की श्रेणी में नहीं गिना जाता और इसमें किसी भी प्रकार के सूतक के विचार की आवश्यकता नहीं होती। फिर भी, मन की शांति और सकारात्मक ऊर्जा के लिए कई लोग इस समय मेडिटेशन करना पसंद करते हैं।

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    इस दौरान ईश्वर का ध्यान करना शुभ फलदायी माना गया है। व्यवसाय और दैनिक कार्यों के संचालन में उपच्छाया ग्रहण कोई बड़ी बाधा उत्पन्न नहीं करता है। अपनी बड़ी इच्छाएं पूरी करने और मानसिक स्पष्टता प्राप्त करने के लिए ग्रहण के इन वैज्ञानिक पहलुओं को समझना हर व्यक्ति के लिए लाभदायक सिद्ध होता है।

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    लेखक: दिव्या गौतम, Astropatri.com अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए hello@astropatri.com पर संपर्क करें।