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    आपका बच्चा भी गंडमूल नक्षत्र में जन्मा है? क्यों 27 दिनों तक पिता नहीं देख सकते बच्चे की सूरत

    Updated: Thu, 15 Jan 2026 06:24 PM (IST)

    क्या आपका बच्चा गंडमूल नक्षत्र में जन्मा है? ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, ऐसे बच्चों के पिता को 27 दिनों तक उनकी सूरत नहीं देखनी चाहिए। जानिए इस परंपरा ...और पढ़ें

    गंडमूल नक्षत्र में पैदा हुआ आपका बच्चा? (Image Source: AI-Generated)

    गंडमूल नक्षत्र में पैदा हुआ आपका बच्चा? (Image Source: AI-Generated)

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, बच्चे का जन्म किस नक्षत्र में हुआ है, इसका उसके स्वभाव और भविष्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है। कुछ नक्षत्रों को 'गंडमूल नक्षत्र' की श्रेणी में रखा गया है। जब बच्चा इन नक्षत्रों में पैदा होता है, तो पारंपरिक रूप से 27 दिनों के बाद एक विशेष पूजा की जाती है, जिसे 'सतैसा' (Sataisa) कहा जाता है। आइए जानते हैं कि गंडमूल नक्षत्र क्या हैं। साथ ही, इनका बच्चे पर क्या असर होता है और 'सतैसा' पूजा क्यों करना जरूरी है।

    क्या होते हैं गंडमूल नक्षत्र?

    ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, आकाश मंडल के 27 नक्षत्रों में से 6 नक्षत्रों (अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल और रेवती) को 'गंडमूल' माना जाता है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, जब राशि और नक्षत्र एक ही बिंदु पर समाप्त होते हैं, तो वहां एक 'संधि' या गांठ (Ganda) बनती है। इसी कारण इन्हें गंडमूल नक्षत्र कहा जाता है।

    बच्चे और परिवार पर इसका प्रभाव

    मान्यता है कि इन नक्षत्रों में जन्म लेने वाले बच्चों पर ग्रहों का प्रभाव थोड़ा उग्र हो सकता है:

    स्वभाव: ऐसे बच्चे बहुत तेज बुद्धि के लेकिन जिद्दी या थोड़े गुस्सैल स्वभाव के हो सकते हैं।

    माता-पिता पर प्रभाव: पुराने समय में माना जाता था कि बिना शांति पूजा के ये नक्षत्र माता, पिता या मामा के लिए भारी हो सकते हैं। हालांकि, आधुनिक ज्योतिष इसे केवल एक 'ऊर्जा संतुलन' की प्रक्रिया मानता है।

    भाग्य: अगर इन नक्षत्रों की शांति करा ली जाए, तो यही बच्चे आगे चलकर बहुत प्रभावशाली और साहसी बनते हैं।

    'सतैसा' पूजा: 27वें दिन का विधान

    नारद पुराण के नक्षत्र ज्योतिष खंड में गंडमूल नक्षत्रों और उनसे संबंधित शांति विधानों का विस्तृत वर्णन मिलता है। जब बच्चा जन्म के ठीक 27वें दिन उसी नक्षत्र में वापस आता है जिसमें उसका जन्म हुआ था, तब 'सतैसा' पूजा की जाती है। इसके बाद दी पिता को अपने बच्चे का चेहरा देखना चाहिए।

    Sataisa Puja

    (Image Source: AI-Generated)

    27 कुओं या नदियों का जल: इस पूजा में प्रतीकात्मक रूप से विभिन्न स्थानों का जल और मिट्टी इस्तेमाल की जाती है।

    27 पेड़ों के पत्ते: प्रकृति की शक्ति को समाहित करने के लिए अलग-अलग पेड़ों के पत्तों का उपयोग होता है।

    छाया दान: बच्चे और पिता को एक घी के कटोरे में अपना चेहरा देखना होता है (छाया दान), जिसे बाद में दान कर दिया जाता है।

    ब्राह्मण भोज: पूजा के बाद दान-पुण्य करने से नक्षत्र का नकारात्मक प्रभाव समाप्त हो जाता है।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।

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