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'गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु...': जानिए इस महामंत्र का असली अर्थ और जीवन में गुरु का महत्व

Updated: Fri, 21 Aug 2026 11:04 AM (IST)

'गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु' श्लोक का असली अर्थ क्या है? जानिए क्यों शास्त्रों में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान मानकर परब्रह्म का दर्जा दिया गया है।

पढ़ें जीवन में गुरु का महत्व (AI-Generated Image)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। "गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरा। गुरु साक्षात परब्रह्म, तस्मै श्री गुरुवे नम:॥"

हम सभी ने बचपन से घर, स्कूल या मंदिरों में यह श्लोक जरूर सुना है। लेकिन, क्या आपने कभी इसके अंदर छिपे जीवन के सबसे गहरे दर्शन को समझने की कोशिश की है? यह मात्र एक श्लोक नहीं है, बल्कि यह बताता है कि एक शिष्य के जीवन में गुरु का स्थान क्या होता है। आइए इस श्लोक के एक-एक शब्द का अर्थ समझते हैं।

गुरु ही त्रिदेव क्यों हैं?

हमारे शास्त्रों में गुरु को साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि ब्रह्मांड को चलाने वाली तीन प्रमुख शक्तियों (त्रिदेव) के समान माना गया है:

गुरु ब्रह्मा: जिस तरह ब्रह्मा जी इस सृष्टि की रचना करते हैं, उसी तरह गुरु हमारे भीतर ज्ञान, अच्छे संस्कारों और एक नए व्यक्तित्व का सृजन (निर्माण) करते हैं।

गुरु विष्णु: भगवान विष्णु जिस तरह इस दुनिया का पालन-पोषण करते हैं। एक सच्चा गुरु भी अपने शिष्य के भीतर दिए गए ज्ञान की रक्षा करता है, उसे सही मार्ग पर चलाता है और जीवन की परेशानियों में उसका पालन करता है।

गुरु देवो महेश्वरा: शिव जी बुराइयों का अंत करते हैं। ठीक उसी तरह, हमारे गुरु हमारे अंदर के अज्ञान, अहंकार, अंधकार और बुराइयों का नाश करते हैं।

गुरु साक्षात परब्रह्म: जब गुरु में ये तीनों शक्तियां समाहित हैं, तो वह साक्षात सर्वोच्च शक्ति यानी 'परब्रह्म' का ही रूप बन जाते हैं। ऐसे परम गुरु को हम नमन करते हैं।

भगवान से भी ऊंचा क्यों है गुरु का स्थान?

कबीरदास जी ने भी कहा है, "गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।" भगवान हमें यह जीवन देते हैं, लेकिन इस जीवन को सही ढंग से कैसे जीना है, सत्य और असत्य में क्या फर्क है, और ईश्वर तक कैसे पहुंचना है यह रास्ता सिर्फ एक गुरु ही दिखा सकता है।

अगर जीवन में कोई गुरु न हो, तो क्या करें?

इष्टदेव या ईश्वर: आप अपने इष्टदेव (जिस भगवान को आप पूजते हैं) को अपना परम गुरु मानकर उनसे ज्ञान ले सकते हैं।

माता-पिता: हमारे जीवन के सबसे पहले गुरु हमारे माता-पिता ही होते हैं। आप उन्हें गुरु मानकर उनका सम्मान कर सकते हैं।

प्रकृति और अनुभव: दत्तात्रेय भगवान ने तो प्रकृति (धरती, जल, आकाश) से भी बहुत कुछ सीखा था। प्रकृति और हमारे अनुभव भी बहुत बड़े गुरु होते हैं।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।