प्रदोष व्रत पर सुबह नहीं, शाम को खुलती है किस्मत, सूर्यास्त के समय ही क्यों होती है शिव जी की पूजा?
भगवान शिव को समर्पित 'प्रदोष व्रत' हर महीने में दो बार आता है। इस दिन सूर्यास्त के समय प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा करने से जातक को सुख-समृद्धि का ...और पढ़ें

गुरु प्रदोष व्रत का महत्व (Picture Credit: Freepik)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। गुरुवार, 27 मई को ज्येष्ठ मास का दूसरा प्रदोष व्रत रखा जाएगा। गुरुवार के दिन पड़ने के कारण इसे 'गुरु प्रदोष' या 'बृहस्पति प्रदोष' भी कहा जाता है। भगवान शिव की असीम कृपा और देवगुरु बृहस्पति का आशीर्वाद पाने के लिए यह दिन बेहद खास माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस तिथि पर प्रदोष काल में ही शिव जी की पूजा क्यों की जाती है?
प्रदोष काल में ही क्यों होती है शिव पूजा?
प्रदोष काल की शुरुआत सूर्यास्त के साथ ही हो जाती है। शास्त्रों के अनुसार, जिस दिन त्रयोदशी तिथि और प्रदोष काल एक साथ व्याप्त होते हैं (इसे त्रयोदशी और प्रदोष का अधिव्यापन भी कहते हैं), वह समय भगवान शिव की पूजा और आराधना के लिए सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक फलदायी माना जाता है। इसलिए प्रदोष व्रत पर प्रदोष काल में शिव जी की पूजा का विधान है, ताकि साधक को भगवान शिव की पूजा का अधिक-से-अधिक फल प्राप्त हो सके।

(Picture Credit: Freepik)
गुरु प्रदोष पूजा का शुभ मुहूर्त
ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि का शुभारंभ 28 मई को सुबह 7 बजकर 56 मिनट पर हो रहा है। वहीं इस तिथि का समापन 29 मई को सुबह 9 बजकर 50 मिनट पर हो रहा है। प्रदोष व्रत पर महादेव की पूजा हमेशा सूर्यास्त के बाद यानी प्रदोष काल में ही करनी चाहिए। गुरु प्रदोष व्रत की पूजा का मुहूर्त कुछ इस प्रकार रहने वाला है -
पूजा का शुभ समय - शाम 7:12 बजे से रात 9:15 बजे तक
-1779869944085.jpg)
(Picture Credit- AI Generated)
गुरु प्रदोष व्रत का अचूक महत्व
भगवान शिव को प्रदोष का दिन अत्यंत प्रिय है, वहीं गुरुवार का दिन देवगुरु बृहस्पति से संबंधित होने के कारण इस व्रत का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है। यह व्रत विशेष रूप से विद्यार्थियों और आध्यात्मिक साधकों के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। इस दिन व्रत करने से साधक के ज्ञान, उच्च शिक्षा और धर्म-कर्म में वृद्धि होती है।
खबरें और भी
ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति ग्रह को विवाह, संतान और दान आदि का मुख्य कारक माना गया है। इस व्रत को करने से इन सभी क्षेत्रों में आ रही बाधाएं दूर हो सकती हैं और जीवन में स्थिरता बनी रहती है। इस दिन पूरी श्रद्धा के साथ व्रत करने से साधक को देवगुरु बृहस्पति की कृपा मिलती है, जिससे व्यक्ति को समाज में मान-सम्मान, धन-धान्य और अपार सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
यह भी पढ़ें- 28 को है मई का आखिरी प्रदोष व्रत, इस शुभ मुहूर्त में पूजा करने से चमकेगी किस्मत
यह भी पढ़ें- कैलाश के वैरागी से गृहस्थ बनने तक का सफर, कैसा था शिव जी की बारात का नजारा, जिसने सबको चौंका दिया?
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।