कैलाश के वैरागी से गृहस्थ बनने तक का सफर, कैसा था शिव जी की बारात का नजारा, जिसने सबको चौंका दिया?
रामचरितमानस के बालकांड में भगवान शिव के दूल्हे के स्वरूप और उनकी बारात का अद्भुत वर्णन मिलता है। ...और पढ़ें
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महादेव की बारात का अद्भुत और चौंकाने वाला नजारा (Picture Credit- AI Generated)
HighLights
रामचरितमानस के बालकांड में मिलता है शिव विवाह का वर्णन
दूल्हे के रूप में अनोखे और अद्भुत लग रहे थे भगवान शिव
भूत-पिशाच के साथ-साथ देवी-देवता भी थे बारात में शामिल
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। माता पार्वती और भगवान शिव का विवाह देवलोक के लिए बहुत ही खुशी का विषय था, क्योंकि माता पार्वती की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर परम वैरागी भगवान शिव ने गृहस्त जीवन में प्रवेश किया था। जब भगवान शिव, पार्वती जी से विवाह करने के लिए बारात लेकर उनके द्वार पर पहुंचे, तो बारात को देखकर सभी अचंभित रह गए थे।
दूल्हे के रूप में महादेव का निराला स्वरुप
श्री रामचरितमानस के बालकांड में शिव जी के विवाह का अत्यंत रोचक वर्णन मिलता है। वैदिक रीति से हुए इस विवाह में जब महादेव दूल्हा बने, तो उनका रूप बहुत ही अनूठा था, जिसका वर्णन इस प्रकार है -
सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा। जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा॥
कुंडल कंकन पहिरे ब्याला। तन बिभूति पट केहरि छाला॥1॥
शिव जी के गणों ने शिवजी का शृंगार किया। जटाओं का मुकुट बनाकर उस पर सांपों का मौर सजाया गया। शिव जी ने सांपों के ही कुंडल और कंकण (कलाई में पहने जाने वाला आभूषण) पहने। शरीर पर विभूति रमायी गई और वस्त्र के रूप में बाघम्बर लपेटा गया।

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ससि ललाट सुंदर सिर गंगा। नयन तीनि उपबीत भुजंगा॥
गरल कंठ उर नर सिर माला। असिव बेष सिवधाम कृपाला॥2॥
शिव जी के सुंदर मस्तक पर चंद्रमा, सिर पर गंगा जी, तीन नेत्र, सांपों का जनेऊ, गले में विष और छाती पर नरमुण्डों की माला विराजमान थी। इस प्रकार उनका वेष अशुभ होने पर भी वे कल्याण के धाम और कृपालु हैं।
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कर त्रिसूल अरु डमरु बिराजा। चले बसहँ चढ़ि बाजहिं बाजा॥
देखि सिवहि सुरत्रिय मुसुकाहीं। बर लायक दुलहिनि जग नाहीं॥3॥
शिव जी ने एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में डमरू लिया हुआ है। शिव जी बैल पर सवार हुए और बाजे बज रहे हैं। शिव जी को देखकर देवांगनाएं मुस्कुरा रही हैं और कह रही हैं कि इस वर के योग्य दुलहिन संसार में नहीं मिलेगी। इस प्रकार शिव जी दूल्हे के रूप में तैयार हुए।
तन छार ब्याल कपाल भूषन नगन जटिल भयंकरा।
सँग भूत प्रेत पिसाच जोगिनि बिकट मुख रजनीचरा॥
जो जिअत रहिहि बरात देखत पुन्य बड़ तेहि कर सही।
देखिहि सो उमा बिबाहु घर घर बात असि लरिकन्ह कही॥
लोग बारात को देखकर तरह-तरह की बातें करने लगे और कहने लगे कि दूल्हे के शरीर पर राख लगी है, सांप और कपाल के गहने हैं। वह जटाधारी और भयंकर हैं। उनके साथ भयानक मुखवाले भूत, प्रेत, पिशाच, योगिनियां और राक्षस हैं। जो भी इस बारात को देखकर जीता बचेगा, सचमुच उसके बड़े ही पुण्य किए होंगे, जिससे वह पार्वती का विवाह देख सकेगा।
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(Picture Credit: Freepik) (AI Image)
कैसी थी शिव जी की बारात
कहा जाता है कि ऐसा कोई जीव नहीं था, जो शिव जी के बारात में शामिल न हुआ हो। इसका वर्णन बालकांड के इस छंद में मिलता है -
तन कीन कोउ अति पीन पावन कोउ अपावन गति धरें।
भूषन कराल कपाल कर सब सद्य सोनित तन भरें॥
खर स्वान सुअर सृकाल मुख गन बेष अगनित को गनै।
बहु जिनस प्रेत पिसाच जोगि जमात बरनत नहिं बनै॥
शिव जी की बारात में कोई बहुत दुबला, कोई बहुत मोटा, कोई पवित्र और कोई अपवित्र वेष धारण किए हुए है। भयंकर गहने पहने हाथ में कपाल लिए हैं और सभी ने शरीर में ताजा खून लगाया हुआ है। उनकी बारात में गणों के अनगिनत वेष शामिल थे, जिन्हें गिनना भी मुश्किल है। बहुत प्रकार के प्रेत, पिशाच और योगिनियों की जमाते हैं, जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता।