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    7 फेरे या सिर्फ 4? हिंदू विवाह की वो प्राचीन परंपरा, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं

    Updated: Fri, 17 Apr 2026 07:26 PM (IST)

    हिंदू विवाह में सात फेरों की परंपरा बहुत प्रसिद्ध है, लेकिन वैदिक परंपराओं में मूल रूप से चार फेरों का उल्लेख मिलता है। ये चार फेरे जीवन के चार पुरुषा ...और पढ़ें

    चार फेरे जीवन के चार पुरुषार्थ

    चार फेरे जीवन के चार पुरुषार्थ

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    समय कम है?

    जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

    संक्षेप में पढ़ें

    आनंद सागर पाठक। भारतीय संस्कृति में विवाह सिर्फ दो लोगों का मिलन नहीं, बल्कि दो परिवारों और दो आत्माओं का पवित्र बंधन माना जाता है। हिंदू विवाह की जब भी बात होती है, तो सबसे पहले “सात फेरे” का उल्लेख आता है।

    लेकिन प्राचीन वैदिक ग्रंथों और कई पारंपरिक परंपराओं में विवाह के मूल रूप में चार फेरों का विधान बताया गया है। इन चार फेरों का संबंध जीवन के चार पुरुषार्थों – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – से माना जाता है। यही कारण है कि आज भी कुछ समुदायों में चार फेरों की परंपरा कायम है।

    जीवन के चार स्तंभ और विवाह के चार फेरे:

    हिंदू दर्शन के अनुसार मानव जीवन चार प्रमुख उद्देश्यों पर आधारित है – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। विवाह के चार फेरे इन्हीं चार पुरुषार्थों का प्रतीक माने जाते हैं।

    1. पहला फेरा: धर्म (कर्तव्य और नैतिकता):

    पहला फेरा जीवन में धर्म और कर्तव्य के मार्ग पर चलने का संकल्प होता है। इस चरण में दूल्हा और दुल्हन यह वचन लेते हैं कि वे अपने परिवार, समाज और एक-दूसरे के प्रति ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का पालन करेंगे।

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    इस फेरे में पत्नी आगे चलती है। यह इस बात का प्रतीक है कि वह परिवार की नींव रखने और सही मार्ग दिखाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

    “विवाह केवल साथ रहने का वचन नहीं, बल्कि धर्म के मार्ग पर साथ चलने का संकल्प है।”

    2. दूसरा फेरा: अर्थ (संपन्नता और जीवन की व्यवस्था):

    दूसरा फेरा जीवन में आर्थिक स्थिरता और परिवार के पालन-पोषण से जुड़ा होता है। पति-पत्नी यह वचन लेते हैं कि वे मेहनत करेंगे और अपने परिवार को सुरक्षित और समृद्ध बनाएंगे।

    इस चरण में भी पत्नी आगे रहती है, क्योंकि भारतीय परंपरा में स्त्री को घर की लक्ष्मी माना जाता है।

    “जहां स्त्री का सम्मान होता है, वहां समृद्धि और शांति दोनों निवास करते हैं।”

    3. तीसरा फेरा: काम (प्रेम और भावनात्मक संतुलन):

    तीसरा फेरा प्रेम, स्नेह और रिश्तों की मिठास का प्रतीक है। यह फेरा दंपति के बीच भावनात्मक जुड़ाव, विश्वास और परिवार को आगे बढ़ाने की इच्छा को दर्शाता है।

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    (Image Source: AI-Generated)

    यह फेरा यह भी बताता है कि विवाह सिर्फ सामाजिक व्यवस्था नहीं, बल्कि भावनात्मक और मानसिक सहयोग का भी आधार है।

    “विवाह का वास्तविक अर्थ है – दो आत्माओं का प्रेम और विश्वास के साथ एक होना।”


    4. चौथा फेरा: मोक्ष (आध्यात्मिक उन्नति):

    चौथा और अंतिम फेरा जीवन के अंतिम लक्ष्य – मोक्ष – से जुड़ा हुआ है। यह आध्यात्मिक यात्रा का प्रतीक है।

    इस फेरे में पति आगे चलता है, जो इस बात का संकेत है कि वह परिवार को आध्यात्मिक दिशा देने और जीवन के अंतिम सत्य तक पहुंचाने में अग्रणी भूमिका निभाएगा।

    “सच्चा विवाह वह है जो केवल जीवन नहीं, आत्मा की यात्रा को भी पूर्ण करे।”

    सात फेरों का महत्व और ‘सप्तपदी’

    हिंदू विवाह में सात फेरों की रस्म को सप्तपदी कहा जाता है। इसका अर्थ है सात कदम। इन सात कदमों के साथ दूल्हा-दुल्हन सात वचन लेते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार सप्तपदी के बाद ही विवाह पूर्ण माना जाता है। सात का अंक हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है:

    1) सात जन्मों का बंधन
    2) सप्ताह के सात दिन
    3) सप्त ऋषि
    4) सात लोक
    5) सात समुद्र

    “सात कदम साथ चलने वाले दो लोग केवल जीवन नहीं, भाग्य भी साझा करते हैं।”

    अंक ज्योतिष में 4 और 7 का महत्व:

    अंक ज्योतिष के अनुसार भी 4 और 7 दोनों संख्याएं विशेष अर्थ रखती हैं।

    • 4 का संबंध राहु से माना जाता है।

    यह संख्या भौतिक जीवन, व्यवस्था और स्थिरता का प्रतीक है। विवाह के चार फेरे भौतिक जीवन की जिम्मेदारियों और सुखों को दर्शाते हैं।

    • 7 का संबंध केतु से माना जाता है।

    यह संख्या आध्यात्मिकता, आत्मिक जुड़ाव और जीवन के उच्च उद्देश्य को दर्शाती है।

    इसी कारण कई विद्वान मानते हैं कि:

    “चार फेरे जीवन की व्यवस्था बनाते हैं, जबकि सात फेरे आत्माओं का मिलन कराते हैं।”

    चार फेरों से सात फेरों तक की परंपरा:

    प्राचीन वैदिक विवाह में चार फेरों और सप्तपदी के सात वचनों का अलग-अलग महत्व था। समय के साथ इन दोनों परंपराओं को मिलाकर सात फेरों की प्रथा प्रचलित हो गई। आज भी आर्य समाज, गुजरात और राजस्थान के कई समुदायों में चार फेरों की परंपरा देखने को मिलती है।

    निष्कर्ष:

    हिंदू विवाह परंपरा में चार और सात दोनों फेरों का अपना अलग-अलग महत्व है। चार फेरे जीवन के चार पुरुषार्थों – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – को दर्शाते हैं, जबकि सात फेरे आध्यात्मिक बंधन और सात वचनों का प्रतीक हैं।
    असल में विवाह का सार फेरों की संख्या में नहीं, बल्कि उस संकल्प में छिपा है जिसे दो लोग जीवन भर निभाने का वादा करते हैं।

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     लेखक: आनंद सागर पाठक, Astropatri.com फीडबैक के लिए: hello@astropatri.com