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    क्या जैन धर्म में मृत्यु से पहले ही कर दिया जाता है अंतिम संस्कार? सल्लेखना की अनोखी परंपरा का रहस्य

    Updated: Wed, 22 Jul 2026 12:06 PM (IST)

    जैन धर्म में सल्लेखना एक अनोखी परंपरा है, इसमें साधु-सन्यासी मृत्यु से पहले ही अन्न-जल त्यागकर समाधि लेते हैं। इसे जीवन की अंतिम साधना माना जाता है, ज ...और पढ़ें

    जैन धर्म की सल्लेखना परंपरा: मृत्यु से पहले अंतिम संस्कार का रहस्य (Picture Credit:AI Generated)

    जैन धर्म की सल्लेखना परंपरा: मृत्यु से पहले अंतिम संस्कार का रहस्य (Picture Credit:AI Generated)

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। मृत्यु के बाद किया जाने वाला अंतिम संस्कार 16 संस्कारों में सर्वोपरि माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि जो इस धरती पर आया है उसे एक न एक दिन जाना जरूर है, लेकिन जब अंतिम संस्कार की प्रक्रिया नियम से की जाती है तब मृतक की आत्मा को शांति मिलती है।

    इसी वजह से मृत व्यक्ति को अंतिम विदाई पूरे रीति-रिवाज के साथ दी जाती है। हालांकि, सभी धर्मों में इसकी अलग प्रक्रिया है और उसी का पालन करते हुए अंतिम विदाई दी जाती है।

    जहां हिंदू धर्म में दाह संस्कार किया जाता है, वहीं इस्लाम में मृतक को दफनाया जाता है। यही नहीं पारसी धर्म में मृतक की आत्मा को मुक्ति दिलाने के लिए टावर ऑफ साइलेंस में छोड़ दिया जाता है।

    ऐसे ही जैन धर्म में अंतिम संस्कार की एक अनोखी परंपरा है जिसमें जैन साधु-साध्वी मृत्यु से पहले ही अंतिम संस्कार कर लेते हैं जिसे सल्लेखना कहा जाता है। आइए आपको बताते हैं जैन धर्म के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया के बारे में।

    जैन धर्म में कैसे किया जाता है अंतिम संस्कार

    जैन धर्म के आम लोगों के अंतिम संस्कार की विधि हिंदू धर्म के समान हो होती है और उन्हें भी मृत्योपरांत मुखाग्नि दी जाती है। वहीं जब हम जैन साधुओं की बात करते हैं तो उनके लिए अंतिम संस्कार के अलग नियम हैं।

    जैन धर्म में एक अलग परंपरा है जिसमें जैन साधु मृत्यु से कुछ दिन पहले से ही अन्न-जल का त्याग करके समाधि ले लेते हैं।

    इसमें जैन साधु एक उपवास करते हैं और पूर्ण रूप से साधना में लीन हो जाता है। इस प्रक्रिया को जिसको सल्लेखना कहा जाता है। निर्जला उपवास करते हुए साधना करने से कुछ ही दिनों बाद उनकी आत्मा शरीर को त्याग देती है और उनकी मृत्यु हो जाती है।

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    आमतौर पर यह प्रक्रिया साधारण लोगों के लिए नहीं बल्कि साधुओं के लिए ही है और उनका मानना है कि इससे मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है।

    जैन साधु सल्लेखना को ही मानते हैं अंतिम संस्कार

    जैन धर्म के साधुओं को जब ऐसा लगता है कि उनका शरीर अब समाप्त होने वाला है, तो वो अन्न-जल को त्यागकर समाधि लेते हैं। उनके लिए यह समाधि लेना और त्याग करना अंतिम संस्कार के बराबर ही होता है। इसी वजह से सल्लेखना को जैन साधुओं के अंतिम संस्कार का ही एक रूप माना जाता है।

    क्या है सल्लेखना की परंपरा

    सल्लेखना का उल्लेख जैन धर्म के प्राचीन ग्रंथों जैसे भगवती आराधना और रत्नकरण्ड श्रावकाचार में मिलता है। सल्लेखना जिसे संथारा भी कहा जाता है इसके जरिए जैन साधु-संत समाधि लेते हैं। सल्लेखना शब्द दो अलग-अलग शब्दों से मिलकर बना है जो है सत और लेखन का मेल है।

    जिसका मतलब है अच्छाई का लेखाजोखा रखना। जैन धर्म की परंपरा के अनुसार मृत्यु को नजदीक देखकर धीरे-धीरे खानपान को त्याग देना सल्लेखना या संथारा कहलाता है। इसे जीवन की अंतिम साधना भी माना जाता है। यह सदियों पुरानी परंपरा है जिसका अनुसरण आम तौर पर जैन साधुओं द्वारा किया जाता है। इसके जरिए जैन साधु अपने कर्मों के बंधन से मुक्त होते हैं और मोक्ष को प्राप्त करते हैं।

    मृत्यु से पहले ही सल्लेखना से शरीर त्यागना जैन धर्म की एक अनोखी परंपरा है जिसका पालन कई साधु सन्यासी सदियों से करते चले आ रहे हैं। वास्तव में यह प्रक्रिया अन्य धर्मों से अलग है।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।