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    माखन-मिश्री के अलावा भगवान कृष्ण को खाने में और क्या पसंद था? भगवद्गीता के श्लोकों में छिपा है जवाब

    Updated: Wed, 22 Jul 2026 10:29 AM (IST)

    भगवान कृष्ण ने भगवद्गीता में स्वयं बताया है कि वे फल, सब्जियां, अनाज और दूध जैसे सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। ...और पढ़ें

    माखन-मिश्री के अलावा भगवान श्रीकृष्ण के प्रिय भोजन  (Picture Credits- AI Image)

    माखन-मिश्री के अलावा भगवान श्रीकृष्ण के प्रिय भोजन (Picture Credits- AI Image)

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भगवान कृष्ण का नाम याद करते ही उनसे जुड़ी कई छवि हमारे मन में आने लगती है। कई लोगों को भगवान कृष्ण ग्वाला के रूप में याद आते होंगे, कुछ को महाभारत काल में अर्जुन के दिव्य मार्गदर्शक तो कुछ भक्तों को माखन-मिश्री खाने वाले नटखट कान्य की छवि याद होगी। लेकिन क्या आपको पता है कि, ब्रह्मांड के पालनकर्ता भगवान श्रीकृष्ण असल में क्या खाते थे?

    इसका सटीक और गहरा जवाब हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता में छिपा है। गीता के श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने खुद बताया कि, वे किस तरह का भोजन ग्रहण करते थे। आइए जानते हैं भगवान कृष्ण का वास्तविक आहार क्या था और वे अपने भक्तों से क्या उम्मीद रखते हैं?

    भगवान श्रीकृष्ण का प्रिय भोजन क्या है? 

    भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि, 'जो कोई भी मुझे सच्चे मन और भक्ति-भाव से फल, सब्जियां, अनाज और दूध देता है, मैं उसे खाता हूं।' इसलिए हमें भगवान श्रीकृष्ण को इन सभी चीजों का भोग लगाना चाहिए।

    भगवान कृष्ण के बचपन की सबसे पसंदीदा पदार्थ माखन-मिश्री, जिसे वे गोपियों के घर से चुराया करते थे।

    इसके अलावा भगवान कृष्ण रोजाना दूध, दही और छाछ काफी पीते थे। इसके अलावा सात्विक आहार के रूप में उन्हें हरी सब्जियां और साग काफी प्रिय था। फलों में उन्हें केला, नारियल और मौसमी फल काफी पसंद थे।

    भगवद्गीता में श्री कृष्ण के अनुसार कैसा भोजन करना चाहिए?

    भगवान श्रीकृष्ण ने भोजन को तामसिक, सात्विक और राजसिक श्रेणी में बांटा है। भगवद्गीता में उन्होंने बताया है कि, ऐसा भोजन जिसे अधिक पकाया गया हो, बासी और जो अपना प्राकृतिक रूप और पौषक खो देता है, ऐसा खाना खाने से बचना चाहिए। इस श्रेणी में मांसाहारी भोजन, बासी या पिछले दिनों का बचा हुआ खाना शामिल है।

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    सात्विक भोजन - श्लोक संदर्भ

    आयुः-सत्त्व-बलारोग्य-सुख-प्रीति-विवर्धनाः |
    रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विक-प्रियाः || (भगवद्गीता 17:8)

    अर्थ- सात्विक स्वभाव वाले लोग ऐसा खाना पसंद करते हैं जो उम्र बढ़ाता है, गुण, शक्ति, सेहत, खुशी और संतुष्टि में वृद्धि करता है। ऐसा भोजन रसीला, पौष्टिक और प्राकृतिक रूप से स्वादिष्ट होता है।

    राजसिक भोजन - श्लोक संदर्भ:

    कट्वम्ल-लवणात्युष्ण- तीक्ष्ण-रूक्ष-विदाहिनः |
    आहारा राजसस्येष्टा दुःख-शोकामय-प्रदाः || (भगवद्गीता 17:9)

    अर्थ: बहुत कड़वा, बहुत खट्टा, नमकीन, बहुत गर्म, तीखा, सूखा और मिर्च वाला भोजन राजसिक स्वभाव वाले लोगों को पसंद होता है। ऐसा भोजन दर्द, दुख और बीमारी उत्पन्न करता है।

    तामसिक भोजन - श्लोक संदर्भ:

    यात-यामं गत-रसं पूति पर्युषितं च यत् |
    उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामस-प्रियम् || (भगवद्गीता 17:10)

    अर्थ:बहुत अधिक पका हुआ, बासी, सड़ा हुआ, दूषित और अशुद्ध भोजन तामसिक स्वभाव वाले लोगों को पसंद होता है।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।