जब धृतराष्ट्र ने भीम को मारने की साजिश रची, तो भगवान श्रीकृष्ण ने ऐसे बचाई जान
भगवान श्रीकृष्ण की चतुराई से भीम के प्राण बच सके। आइए जानते हैं धृतराष्ट्र की साजिश और उसके पीछे के पूरे घटनाक्रम के बारे में। ...और पढ़ें
-1780296585370_m.webp)
श्रीकृष्ण ने भीम को कैसे बचाया? (Picture Credit- AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। आज हम आपको महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद की एक कथा बताने जा रहे हैं। अधर्म पर धर्म की विजय के बाद पांडव अपनी जीत की औपचारिकताएं पूरी कर रहे थे। लेकिन इस जीत के बाद धृतराष्ट्र ने एक साजिश रची, जिसने शक्तिशाली योद्धाओं में से एक, महाबली भीम के प्राण संकट में डाल दिए थे। चलिए पढ़ते हैं अपने 100 पुत्रों, विशेषकर दुर्योधन और दुशासन की मृत्यु के प्रतिशोध में अंधे हो चुके धृतराष्ट्र के बदले की कहानी।
प्रतिशोध की धधकती ज्वाला
महाभारत युद्ध के दौरान भीम ने अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करते हुए धृतराष्ट्र के पुत्रों का संहार किया था। भीम ने ही गदा युद्ध में दुर्योधन की जंघा तोड़ी और दुशासन की छाती का रक्त पीकर उसका वध किया था। अपने प्रिय और ज्येष्ठ पुत्रों की ऐसी दर्दनाक मृत्यु ने धृतराष्ट्र के भीतर प्रतिशोध की ज्वाला को भड़का दिया था।

(Picture Credit: Freepik) (AI Image)
श्रीकृष्ण ने भांप ली धृतराष्ट्र की चालाकी
युद्ध समाप्त होने के बाद जब महाराज युधिष्ठिर समेत सभी पांडव धृतराष्ट्र और माता गांधारी से आशीर्वाद लेने उनके कक्ष में पहुंचे, तो धृतराष्ट्र ने एक गहरी साजिश रची। उन्होंने अपने मन के कपट को छिपाकर ऐसा नाटक किया जैसे उन्होंने अपने पुत्रों की हत्या के लिए पांडवों को क्षमा कर चुके हैं। उन्होंने बड़े प्रेम से एक-एक करके पांडवों को गले लगाना शुरू किया।
जब भीम की बारी आई, तो धृतराष्ट्र के हाव-भाव बदल गए। लेकिन वहां उपस्थित भगवान श्रीकृष्ण धृतराष्ट्र के मन में चल रहे कपट को पहले ही समझ चुके थे। वे जानते थे कि धृतराष्ट्र के शरीर में दस हजार हाथियों का बल है। जैसे ही धृतराष्ट्र ने भीम को गले लगाने के लिए अपने हाथ आगे बढ़ाए, श्रीकृष्ण ने भीम को पीछे खींच लिया और उनके स्थान पर पहले से तैयार रखी गई लोहे की बनी भीम की मूर्ति को धृतराष्ट्र के सामने बढ़ा दिया।
खबरें और भी

(Picture Credit- AI Generated)
धृतराष्ट्र को हुआ पश्चाताप
धृतराष्ट्र को लगा कि उनके सामने असली भीम खड़े हैं। जैसे ही उन्होंने मूर्ति को गले लगाया, वैसे ही उनके भीतर छिपा वर्षों का क्रोध और प्रतिशोध उनकी बाहों में उतर आया। धृतराष्ट्र ने भीम समझकर उस लोहे की ठोस मूर्ति को अपने दोनों हाथों से इतनी शक्ति के साथ दबोचा कि वह वज्र जैसी मजबूत मूर्ति भी टूट गई। लोहे की मूर्ति को नष्ट करने के बाद धृतराष्ट्र को लगा कि उन्होंने भीम के प्राण ले लिए हैं।
जैसे ही उनका क्रोध शांत हुआ, उन्हें एहसास हुआ कि उन्होंने अपने ही भाई के निर्दोष पुत्र की हत्या कर दी। धृतराष्ट्र के पश्चाताप के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने उनसे कहा कि महाराज, भीम जीवित हैं। आपने जिसे नष्ट किया, वह भीम नहीं बल्कि उनके आकार की एक लोहे की मूर्ति थी। इसके बाद श्रीकृष्ण ने असली भीम को धृतराष्ट्र के सामने प्रस्तुत किया, जिसके बाद शांत हो चुके धृतराष्ट्र ने भीम को गले से लगाया और आशीर्वाद दिया।
यह भी पढ़ें- महाभारत युद्ध में योद्धाओं के भोजन का सटीक हिसाब कैसे पता चलता था? जानिए श्री कृष्ण की चमत्कारी लीला!
यह भी पढ़ें- कर्ण के 3 बड़े श्राप: जो महाभारत युद्ध में बने उसकी मौत का सबसे बड़ा कारण
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।