धृतराष्ट्र के तीसरे वरदान में अपना राजपाट मांग सकती थीं द्रौपदी, लेकिन क्षत्रिय धर्म के लिए कर दिया इनकार
आइए जानते हैं कि धृतराष्ट्र ने द्रौपदी को वरदान क्यों दिया और द्रौपदी ने किस तरह अपने विवेक के इस्तेमाल से इन वरदानों का इस्तेमाल किया। ...और पढ़ें
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द्रौपदी ने धृतराष्ट्र के तीन वरदानों में से दो ही क्यों मांगे? (Picture Credit- AI Generated)
HighLights
धृतराष्ट्र ने द्रौपदी को दिए थे तीन वरदान
द्रौपदी ने पांडवों को दासता से मुक्त कराया
तीसरे वरदान को लालच मानकर अस्वीकार किया
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। महाभारत में कौरवों और पांडवों के बीच हुई द्यूतक्रीड़ा यानी चौसर का खेल और उसके बाद हुआ द्रौपदी का 'चीरहरण' कुरुवंश के विनाश का सबसे बड़ा कारण बना। भरी सभा में हुए इस घोर अपमान और उसके बाद उत्पन्न हुए अपशकुनों से घबराकर महाराज धृतराष्ट्र ने द्रौपदी को शांत करने का प्रयास किया और इसी क्रम में उन्होंने पांचाली को वरदान मांगने को कहा।
धृतराष्ट्र ने दिए तीन वरदान
चीरहरण की लज्जाजनक घटना के बाद, जब पांडव अपना सब कुछ हारकर कौरवों के दास (गुलाम) बन चुके थे, तब धृतराष्ट्र ने द्रौपदी के क्रोध से अपने वंश को बचाने के लिए उसे अपनी इच्छा से तीन वरदान मांगने को कहा। विपरीत परिस्थितियों में भी द्रौपदी ने अपने संयम और बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए केवल 2 ही वरदान स्वीकार किए।

द्रौपदी ने मांगे ये दो वरदान
द्रौपदी ने पहला वरदान मांगा कि उनके ज्येष्ठ पति धर्मराज युधिष्ठिर को दासत्व (गुलामी) के बंधन से मुक्त कर दिया जाए। इसके बाद जब धृतराष्ट्र ने द्रौपदी को दूसरा वरदान मांगने को कहा, तो वह पांचाली ने मांगा कि उनके बाकी चारों पतियों यानी भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव को भी उनके अस्त्र-शस्त्रों और रथों के साथ दासता से तुरंत मुक्त कर दिया जाए। पांचाली के दोनों वरदान मांगने पर धृतराष्ट्र ने तथास्तु कहकर पांडवों को दासता से मुक्त कर दिया था।

क्यों ठुकराया तीसरा वरदान?
पांडवों के मुक्त होने के बाद धृतराष्ट्र ने द्रौपदी से तीसरा वरदान मांगने का आग्रह किया, लेकिन उसने तीसरा वरदान लेने से इनकार कर दिया। यह सुनने के बाद सभा में मौजूद सभी लोग हैरान रह गए, क्योंकि द्रौपदी चाहती तो अपना खोया हुआ इंद्रप्रस्थ या छिन चुका सारा राजपाट मांग सकती थीं, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। द्रौपदी ने इसका कारण बताते हुए कहा कि "लालच ही इंसान के धर्म का नाश करता है।"
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साथ ही द्रौपदी ने यह भी कहा कि क्षत्रिय धर्म के अनुसार, एक क्षत्राणी (क्षत्रिय स्त्री) को केवल दो ही वरदान मांगने का अधिकार है। दो से अधिक वरदान मांगना लोभ की श्रेणी में आता है, और इससे वह अपने धर्म को भ्रष्ट नहीं करना चाहती। इस तरह द्रौपदी ने अपनी सूझ-बूझ और धर्म-परायण निर्णय से न केवल पांडवों को दासता के कलंक से मुक्त किया, बल्कि भरी सभा में पांडवों की खोई हुई प्रतिष्ठा को भी वापस हासिल किया।
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