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    जब एक श्राप के कारण राजा पांडु ने छोड़ा राजपाठ, तब कैसे हुई पांडवों की उत्पत्ति?

    Updated: Wed, 22 Apr 2026 03:38 PM (IST)

    राजा पांडु को मिले श्राप के बाद कैसे कुंती के दिव्य मंत्र से पांच पांडवों का जन्म हुआ? पढ़ें श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार पांडवों के जन्म की अनोखी ...और पढ़ें

    पांडवों के जन्म की पौराणिक कथा (Image Source: AI-Generated)

    पांडवों के जन्म की पौराणिक कथा (Image Source: AI-Generated)

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। महाभारत की कहानियां जितनी रोमांचक हैं, उतनी ही रहस्यमयी भी। इन्हीं में से एक सबसे बड़ा रहस्य है पांडवों का जन्म। आखिर क्यों पांडवों को देवताओं का पुत्र कहा जाता है? श्रीमद्भागवत महापुराण के नौवें स्कंध के बीसवें अध्याय में इसका वर्णन मिलता है।

    पांडु की भूल और महर्षि का क्रोध

    हस्तिनापुर के महाराज पांडु को शिकार का बहुत शौक था। एक बार जब वे वन विहार कर रहे थे, तो उन्होंने झाड़ियों के पीछे एक हिरण और हिरणी को संभोग की अवस्था (यौन क्रिया) में देखा। पांडु ने बिना सोचे-समझे एक तीर चलाया जो सीधे उन दोनों को जा लगा।

    जैसे ही तीर लगा, वह मृग जोड़ा अपने वास्तविक स्वरूप में आ गया। वे कोई साधारण पशु नहीं, बल्कि महर्षि किंदम और उनकी पत्नी थे, जो हिरण का रूप धरकर एकांत में प्रेम-क्रीड़ा कर रहे थे।

    महर्षि किंदम ने क्या श्राप दिया?

    मरणासन्न अवस्था में ऋषि किंदम अत्यंत क्रोधित हुए। उन्होंने पांडु को केवल जीव हत्या के लिए नहीं, बल्कि मर्यादा तोड़ने के लिए फटकारा। ऋषि ने कहा कि शिकारियों के नियम के अनुसार भी किसी जीव को उस समय मारना पाप है जब वह प्रजनन या प्रेम में लीन हो।

    ऋषि ने मरते हुए पांडु को अत्यंत कठोर और विवश कर देने वाला श्राप दिया:

    "हे पांडु! तूने क्रूरता की सारी सीमाएं लांघ दी हैं। तूने मुझे उस क्षण कष्ट दिया है जब मैं परम आनंद में था। इसलिए, मैं तुझे श्राप देता हूं कि जिस अवस्था में मेरी मृत्यु हो रही है, वैसी ही स्थिति में तुम्हारी भी मृत्यु होगी। आज के बाद जब कभी भी तू काम-वासना से वशीभूत होकर अपनी पत्नी के समीप जाएगा या संभोग की चेष्टा करेगा, उसी क्षण तेरा अंत हो जाएगा।"

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    राजपाठ छोड़कर बने सन्यासी

    इस श्राप से पांडु इतने दुखी हुए कि उन्होंने अपना राजपाठ छोड़ दिया और अपनी पत्नियों, कुंती और माद्री के साथ जंगल में रहने चले गए। पांडु को बस एक ही चिंता सताती थी कि उनके बाद कुरु वंश का क्या होगा? बिना संतान के तो वंश ही खत्म हो जाएगा।

    कुंती का वो 'जादुई मंत्र'

    जब पांडु बहुत परेशान रहने लगे, तब कुंती ने उन्हें एक गुप्त राज के बारे में बताया। कुंती ने कहा कि बचपन में उनकी सेवा से खुश होकर ऋषि दुर्वासा ने उन्हें एक खास मंत्र दिया था। इस दिव्य मंत्र से वे जिस भी देवता को बुलाएंगी, वह प्रकट होकर उन्हें संतान का आशीर्वाद देंगे। पांडु की आंखों में चमक आ गई और उन्होंने कुंती से इस मंत्र का इस्तेमाल करने को कहा।

    kunti putra

    (Image Source: AI-Generated)

    कैसे हुआ 5 पांडवों का जन्म?

    कुंती ने एक-एक करके देवताओं को याद किया और उनके अंश से पांडवों का जन्म हुआ:

    • युधिष्ठिर: कुंती ने सर्वप्रथम यम यानी धर्म के देवता का आह्वान किया। उनसे युधिष्ठिर जन्मे, जो हमेशा सत्य और धर्म की राह पर चले।
    • भीम: फिर कुंती ने वायुदेव को याद किया। उनसे भीम पैदा हुए, जो दुनिया में सबसे बलशाली माने गए।
    • अर्जुन: तीसरी बार कुंती ने देवराज इंद्र को बुलाया। उनसे अर्जुन का जन्म हुआ, जो महान धनुर्धर (धनुष धारण करने वाला) बने।
    • नकुल और सहदेव: इसके बाद कुंती ने यही मंत्र पांडु की दूसरी पत्नी माद्री को सिखाया। माद्री ने अश्विनी कुमारों (जुड़वां देवता- नासत्य, दस्र) का ध्यान किया, जिनसे नकुल और सहदेव पैदा हुए।

    इस तरह देवताओं की कृपा से पांडु को पांच पुत्र मिले, जिन्हें हम 'पांडव' कहते हैं।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।