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    जैन धर्म के प्रतीकों का गहरा रहस्य: स्वस्तिक, हाथ और तीन बिंदु क्या बताते हैं? यहां पढ़ें धार्मिक महत्व

    Updated: Sun, 09 Aug 2026 06:34 PM (IST)

    जैन धर्म में स्वस्तिक, खुला हाथ और तीन बिंदु जैसे प्रतीकों का गहरा धार्मिक महत्व है। ये चिह्न जैन दर्शन, मूल्यों और जीवन-शैली का प्रतिनिधित्व करते हुए ...और पढ़ें

    जैन धर्म के रहस्यमय प्रतीक: जानें स्वस्तिक, हाथ और तीन बिंदुओं का अर्थ (Picture Credit: AI Generated)

    जैन धर्म के रहस्यमय प्रतीक: जानें स्वस्तिक, हाथ और तीन बिंदुओं का अर्थ (Picture Credit: AI Generated)

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    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हमारे देश में सभी धर्मों और उनके प्रतीकों का अपना अलग महत्व है। जिस तरह से हिंदू धर्म के कई ऐसे चिह्न हैं जिन्हें हम शुभ मानते हैं, वैसे ही जैन धर्म में भी कुछ ऐसे प्रतीक हैं जिनका अपना अलग महत्व होता है।

    इन प्रतीकों के बारे में जैन ग्रंथ जैन आगम स्रोत में भी बताया गया है। जैन प्रतीक सिर्फ एक चिह्न नहीं है बल्कि यह जैन दर्शन, मूल्यों और जीवन-शैली का पूरा प्रतिनिधित्व भी करते हैं।

    जैन मंदिरों, किताबों, घरों और आध्यात्मिक जगहों पर पाए जाने वाले यह चिह्न जैन धर्म की मुख्य शिक्षाओं को एक ही दृश्य रूप में दिखाते हैं। मुख्य रूप से स्वस्तिक, हाथ और तीन बिंदु जैन धर्म के प्रतीक हैं और इन सभी का अपना अलग महत्व है। आइये आपको बताते हैं इन सभी प्रतीकों के अर्थ और इनके धार्मिक महत्व के बारे में।

    अहिंसा के प्रतीक वाला हाथ

    जैन प्रतीक में से एक है खुला हाथ, जिस पर एक पहिया और 'अहिंसा' शब्द अंकित है। खुली हथेली का मतलब होता है 'रुको' दरअसल यह किसी को भी नुकसान पहुंचाने से रोकने के प्रतीक माना जाता है। मुख्य रूप से यह जैन धर्म में अहिंसा का प्रतीक है जिसका अर्थ है किसी को नुकसान पहुंचाने से पहले रुकना।

    अहिंसा का अर्थ है मन, वचन और कर्म से हिंसा न करना। यह प्रतीक हमें इस बारे में बताता है कि हर जीव सम्मान का हकदार है और किसी को भी नुकसान पहुंचाना धर्म के खिलाफ है।

    पहिया यानी धर्म चक्र

    हथेली के अंदर एक पहिया है, जो जन्म और पुनर्जन्म का चक्र माना जाता है। यह इस बात का संकेत देता है कि हर व्यक्ति को अनुशासन और सही आचरण करने की आवश्यकता होती है और व्यक्ति को लगातार आध्यात्मिक प्रगति की ओर बढ़ना चाहिए। यह जैन अनुयायियों को संतुलन, जागरूकता और जिम्मेदारी सिखाता है।

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    स्वास्तिक का चिह्न

    जैन धर्म में स्वास्तिक का निशान किसी व्यक्ति के अस्तित्व की चार अवस्थाओं को दिखाता है। जिसमें स्वर्ग के जीव, मनुष्य,पशु और पौधे, नरक के जीव मुख्य माने जाते हैं। यह जैन अनुयायियों को बताता है कि मानव जीवन दुर्लभ और मूल्यवान है और यह आध्यात्मिक विकास का सबसे अच्छा अवसर देता है। इसलिए मनुष्य जन्म में व्यक्ति को अपने सभी उद्देश्यों को पूरा कर लेना चाहिए।

    तीन बिंदु

    स्वास्तिक के ऊपर तीन बिंदु मौजूद हैं, जो जैन धर्म के तीन रत्नों का प्रतीक माने जाते हैं। इसमें सम्यक् दर्शन यानी सही विश्वास,सम्यक् ज्ञान यानी सही ज्ञान, सम्यक् चारित्र जिसे सही आचरण कहा जाता है। इन सभी बिंदुओं को मोक्ष पाने के लिए तीन स्तंभ जरूरी माने जाते हैं। इसलिए इन तीन बिंदुओं का अपना अलग धार्मिक महत्व है।

    अर्धचंद्र और बिंदु

    प्रतीक के सबसे ऊपर एक अर्धचंद्र और बिंदु मौजूद है, जो मुक्त आत्माओं की अवस्था को दर्शाता है। इसे जैन धर्म का अत्यंत शुभ प्रतीक माना जाता है जो मोक्ष यानी मुक्ति को दिखाता है।

    इस प्रकार जैन धर्म में ये सभी ऐसे प्रतीक माने जाते हैं जिनका अपना अलग महत्व है और जैन ग्रंथों में भी इनका जिक्र मिलता है। ये सभी प्रतीक जैन धर्म का पालन करने का पाठ पढ़ाते हैं।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।