पर्युषण पर्व क्यों मनाया जाता है, जैन धर्म के सबसे बड़े उत्सव का महत्व क्या है?
पर्युषण पर्व जैन धर्म का दस दिवसीय महत्वपूर्ण त्योहार है, जो आध्यात्मिक चिंतन, त्याग और आत्म-शुद्धि का प्रतीक है। यह पर्व क्षमा, अहिंसा और आंतरिक शांत ...और पढ़ें

पर्युषण पर्व: जानें जैन धर्म के इस महापर्व का महत्व (Picture Credit: AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। किसी भी धर्म में अलग-अलग तरह के कई त्योहार मनाए जाते हैं। जिस तरह से हिंदू धर्म के कई ऐसे पर्व हैं जिनका अपना अलग इतिहास है। उसी तरह से जैन धर्म में भी एक है पर्युषण पर्व जो खुद में अलग परंपरा को समेटे हुए है।
यह जैन धर्म का दस दिनों तक चलने वाला त्योहार है, जो आध्यात्मिक चिंतन और त्याग का प्रतीक माना जाता है। इसे श्वेतांबर और दिगंबर, दोनों ही जैन समुदाय के लोग श्रद्धा से मनाते हैं।
यह त्योहार हिंदू कैलेंडर के भाद्रपद महीने यानी अगस्त-सितंबर में मनाया जाता है। इस साल इस पर्व की शुरुआत 8 सितंबर को होगी और समापन 15 सितंबर को होगा।
यह आत्म-चिंतन करने और खुशी को अपने भीतर खोजने का अवसर माना जाता है जो क्षमा मांगने या क्षमा करने के सिद्धात पर आधारित है। आइए आपको बताते हैं इस पर्व का महत्व क्या है और जैन धर्म के इस पर्व को मनाने का कारण क्या है?
पर्युषण पर्व का इतिहास क्या है?
पर्युषण पर्व की शुरुआत सदियों पहले भारत की जीवनशैली से जुड़ी है। काफी समय पहले लोग छोटे-छोटे और दूर बसे गांवों में रहते थे और उनकी आजीविका जमीन में खेती पर ही निर्भर थी। मानसून में बारिश और फसल की कटाई के बाद, खेती के काम से कुछ समय के लिए लोगों को आराम मिल जाता था, क्योंकि इस दौरान सड़क में पानी भर जाता था और कीड़े-मकोड़ों की संख्या बढ़ जाती थी।
जैन धर्म के लोग प्राचीन समय से ही अहिंसा के अनुयायी थे और यदि वो बारिश में यात्रा करते तो पानी के कीड़े मर सकते थे। इसी वजह से वो लोग इस दौरान कहीं भी यात्रा नहीं करते थे और खुद की शुध्दि पर ज्यादा ध्यान देते थे। इस समय अवधि में उन्हें अपना ज्ञान बढ़ाने और दूसरी आध्यात्मिक साधनाओं पर ध्यान देने का मौका मिलता था।
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क्यों मनाया जाता है पर्युषण पर्व?
आज भी जैन धर्म के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक माना जाने वाला पर्युषण पर्व, दुनिया भर के जैन अनुयायियों द्वारा मनाया जाता है और अलग-अलग संप्रदायों के अनुसार यह आठ या दस दिनों तक चलता है। इस पर्व के दौरान जैन धर्म के लोग बाहरी गतिविधियों को कम करने की कोशिश करते हैं और बाहरी आडंबरों से दूर रहते हैं।
यही नहीं लोग इस दौरान किसी के घर भी नहीं जाते हैं और अपने ही घर में रहकर ईश्वर की साधना करते हैं। 'पर्युषण' शब्द 'परि' और 'उषण' के मेल से बना है। 'परि' का अर्थ है 'हर तरह से' और 'उषण' का अर्थ है 'अपने सच्चे स्वरूप में स्थित होना'। इस प्रकार, पर्युषण का त्योहार हर तरह से अपने सच्चे स्वरूप में स्थित होने में मदद करता है।
पर्युषण पर्व का महत्व क्या है?
जैन धर्म के लोगों का पर्युषण पर्व साल में एक बार आता है। यह उन लोगों के लिए सबसे अच्छा समय माना जाता है जो अपनी आंतरिक यात्रा शुरू करना चाहते हैं या उसे और गहरा करना चाहते हैं। इस दौरान, पूरा जैन समुदाय शांति के अपने केंद्र की ओर एक आंतरिक यात्रा पर निकलता है। यह उत्सव पवित्रता और अनुशासन सिखाता है।
यह एक ऐसा आयोजन है जो किसी व्यक्ति की आध्यात्मिक यात्रा शुरू कर सकता है और इस तरह न केवल इस जीवन की, बल्कि लगातार कई जन्मों की दिशा बदल सकता है। इस पर्व के दौरान जैन धर्म के लोग कई तरह के संयम और तप का पालन करते हैं जैसे उपवास, ध्यान और धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करना। यही नहीं वे इन दस दिनों में किसी भी जीव को नुकसान तक नहीं पहुंचाते हैं।
वास्तव में यह पर्व नहीं बल्कि जैन धर्म के लोगों का महापर्व है जो त्याग, तपस्या और संयम की प्रेरणा देकर अहिंसा के मार्ग पर चलना सिखाता है।
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