क्या आप भी पंचामृत और चरणामृत को एक ही समझते हैं? यहां पढ़ें इनके बीच का अंतर
कई लोग पंचामृत और चरणामृत को एक ही समझने की भूल करते हैं, लेकिन इनके बीच बहुत अंतर होता है, जिसके बारे में आ हम आपको बताने जा रहे हैं। ...और पढ़ें

पंचामृत और चरणामृत का अंतर (AI Generated Image)
HighLights
पांच दिव्य पदार्थों का मिश्रण होता है पंचामृत
चरणामृत होता है भगवान के चरणों का जल
पूजा में विशेष महत्व रखते हैं दोनों पवित्र प्रसाद
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। पंचामृत और चरणामृत दोनों हिंदू पूजा में पवित्र प्रसाद हैं, लेकिन इनमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री और इनका उपयोग अलग-अलग है। इनमें समानता यह है कि दोनों को श्रद्धापूर्वक ग्रहण करने से व्यक्ति के पापों व दुखों का नाश होता है और आत्मा की शुद्धि होती है। चलिए जानते हैं पंचामृत और चरणामृत सही अर्थ और महत्व।
पंचामृत का अर्थ व महत्व
पंचामृत (panchamrit) पांच दिव्य पदार्थों यानी दूध, दही, घी, शहद और चीनी के मिश्रण से बनता है, जिसका उपयोग भगवान के अभिषेक के लिए किया जाता है। बाद में इसे भक्तों द्वारा प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। पंचामृत का सनातन धर्म में विशेष है। यह न केवल धार्मिक दृष्टि से लाभदायक है, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी पंचामृत से कई लाभ मिलते हैं।
महत्व - हिंदू धर्म शास्त्रों में पंचामृत को अमृत समान बताया गया है। पंचामृत में शामिल पांच दिव्य सामग्रियां शरीर को शुद्ध करती हैं और सभी प्रकार की नकारात्मकता को दूर करते हैं। यह भी माना गया है कि पंचामृत में हमारे शरीर के पंच तत्वों को शुद्ध करने का भी काम करता है। इसलिए पूजा के बाद पंचामृत जरूर बांटना चाहिए, इससे भक्तजनों पर भगवान का आशीर्वाद बना रहता है।

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क्या है चरणामृत का अर्थ
जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, चरणामृत का अर्थ है भगवान के चरणों का अमृत। इसके लिए मुख्य रूप से शुद्ध जल, तुलसी व तिल आदि का इस्तेमाल किया जाता है, जिसे तांबे के पात्र में रखा जाता है। पूजा में भगवान को इस दिव्य जल से स्नान करवाया जाता है या फिर उनके चरण छुलाए जाते हैं, जिसके बाद यह चरणामृत कहलाता है। इसे भी पूजा के बाद प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।
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महत्व - हिंदू धर्म में यह माना गया है कि भगवान विष्णु के चरणों के जल यानी 'चरणामृत' का सेवन करने से समस्त पाप व दुखों का नाश होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह सकारात्मक ऊर्जा के संचार को बढ़ाता है। विष्णु पुराण और भागवत पुराण में यह बताया गया है कि शुद्ध मन से चरणामृत का सेवन करने से आत्मा शुद्ध होती है। इसे हमेशा दाएं हाथ से लेकर ग्रहण करना चाहिए।
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