कौन हैं सांवलिया सेठ? जिन्हें भक्त मानते हैं अपना 'बिजनेस पार्टनर' और कहते हैं व्यापार का देवता!
राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में सांवलिया सेठ का मुख्य मंदिर स्थित है, जिन्हें व्यापार का देवता भी कहा जाता है। जानिए इसके पीछे का आध्यात्मिक कारण? ...और पढ़ें

सांवलिया सेठ व्यापारियों के देवता (AI-Generated Image)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के मंडफिया गांव में सांवलिया सेठ का मुख्य मंदिर स्थित है। उनका पवित्र धाम भक्ति और आस्था से भरा है। यहां भगवान कृष्ण को 'व्यापार का देवता' सेठ माना जाता है।
भक्त उन्हें व्यापार से लेकर वेतन तक में हिस्सेदार बनाते हैं। मान्यताओं के मुताबिक, जो भक्त जितना देता है, भगवान सांवलिया सेठ उससे कई गुना अधिक भक्तों को वापस लौटाते हैं।
व्यापार करने वाले व्यापारियों के बीच उनकी महिमा काफी ज्यादा है क्योंकि उन्हें व्यापार बढ़ाने वाला देवता माना जाता है।
देश-विदेश से आते हैं भक्त
श्री सांवलिया सेठ के मंदिर का दानपात्र महीने में एक बार खोला जाता है. आपको जानकार हैरानी होगी कि इस मंदिर में उनके दर्शन के लिए अलग-अलग देश से लोग आते हैं। जिस वजह से जब कभी भी मंदिर का दानपात्र खोला जाता है, तो उसमें से डॉलर, पाउंड, दिनार, रियाल समेत अलग-अलग देशों की मुद्रा निकलती है।

(AI-Generated Image)
व्यापारियों के बीच सांवलिया सेठ की महिमा
व्यापारी भगवान सांवलिया सेठ को व्यापार में अपना साझेदार बनाते हैं। अपने बिजनेस की शुरुआत या नए सौदों में भगवान को भी हिस्सेदार बनाया जाता है और कमाई में होने वाले लाभ का 2% से 10% हिस्सा सांवलिया सेठ को समर्पित करते हैं।
राजस्थान और गुजरात के व्यापारियों का मानना है कि, सांवलिया सेठ को व्यापार में हिस्सेदार बनाने से बिजनेस में फायदा होता है, क्योंकि वे व्यापारियों को संरक्षक प्रदान करते हैं।
आपको जानकार हैरानी होगी कि, यह मंदिर चमत्कारिक रूप से धन के आगमन के लिए सुप्रसिद्ध है, जहां हर साल करोड़ रुपये का चढ़ावा आता, जो भगवान का ही हिस्सा होता है।
धार्मिक ग्रंथों में सांविलया सेठ का उल्लेख
धार्मिक ग्रंथों में सांवलिया सेठ का पहला जिक्र सुदामा प्रसंग में देखने को मिलता है। जब सुदामा श्रीकृष्ण से मिलने जाते हैं और वहां उनको महल में छप्पन तरह के पकवान परोसे जाते हैं, तो वे कृष्ण को कहते हैं कि, उनकी पत्नी वसुंधरा और बच्चे भूखे होंगे।
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इतना सुनने के बाद उसी समय श्रीकृष्ण अपना दूसरा रूप धारण करके सुदामा के गांव पहुंच जाते हैं, जहां उनके इस नए रूप का नाम 'सांवले शाह' होता है।
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