जब श्रीकृष्ण ने समय को ही रोक दिया, जानें जयद्रथ वध के पीछे का 'मायावी सच'
कौरवों और पाडवों के बीच लड़ा गया महाभारत का युद्ध इतिहास के सबसे भीषण युद्धों में से एक माना गया है। ...और पढ़ें

जयद्रथ वध की अद्भुत कथा (Picture Credit- AI Generated)
HighLights
अर्जुन ने अभिमन्यु वध का बदला लेने की प्रतिज्ञा ली थी
भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी माया से छिपा दिया था सूर्य
जयद्रथ का सिर उसके पिता की गोद में जा गिरा
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। जयद्रथ सिंधु प्रदेश के राजा थे, जिनका विवाह कौरवों की एकमात्र बहन दुशाला से हुआ था। जयद्रथ को अपने पिता से यह वरदान मिला हुआ था, जो भी उसका वध कर उसका सिर जमीन पर गिरायेगा, उसके खुद के सिर के भी 100 टुकड़े हो जायेंगे। ऐसे में चलिए पढ़ते हैं महाभारत ग्रंथ में वर्णित जयद्रथ वध की अद्भुत कथा।
अर्जुन ने ली ये प्रतिज्ञा
महाभारत का भयंकर युद्ध चल रहा था। अर्जुन की अनुपस्थिति में द्रोणाचार्य ने चक्रव्यूह की रचना की। अर्जुन-पुत्र अभिमन्यु चक्रव्यूह भेदने के लिए उसमें घुस गया, लेकिन उसे चक्रव्यूह से बाहर आना नहीं आता था। इसके बाद कर्ण, द्रोण, दुर्योधन, दु:शासन, कृपाचार्य, अश्वत्थामा और शकुनि उस पर टूट पड़े और वह वीरगति को प्राप्त हो गया।
अभिमन्यु को चक्रव्यूह में फंसाने में मुख्य हाथ जयद्रथ का था। अपने पुत्र की मृत्यु का समाचार सुनकर अर्जुन क्रोध से पागल हो उठा और उसने प्रतिज्ञा की कि यदि अगले दिन सूर्यास्त से पहले उसने जयद्रथ का वध नहीं किया, तो वह आत्मदाह कर लेगा।

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जयद्रथ को हुआ भ्रम
जयद्रथ भयभीत होकर दुर्योधन को अर्जुन की प्रतिज्ञा के बारे में बताया। दुर्योधन ने जयद्रथ को आश्वासन देते हुए कहा कि 'चिंता मत करो, मित्र! मैं और सारी कौरव सेना तुम्हारी रक्षा करेंगे। अर्जुन कल तुम तक नहीं पहुंच पाएगा और उसे आत्मदाह करना पड़ेगा। अगले दिन अर्जुन की यह प्रतिज्ञा पूरी न हो, इसलिए डर के कारण जयद्रथ छिप गया, जिसमें कौरव सेना ने भी उसकी मदद की।
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सूर्यास्त का समय नजदीक था, ऐसे में अर्जुन की प्रतिज्ञा को पूरी करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने एक युक्ति लगाई। उन्होंने अपनी माया से सूर्य को बादलों में छिपा दिया, जिससे अंधकार हो गया और जयद्रथ को सूर्यास्त का भ्रम होने लगा। इसके बाद वह निडर होकर खुद ही अर्जुन के सामने आ गया और उपहास करने लगा। तभी भगवान कृष्ण की माया से सूर्य पुनः दिखने लगा।

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कहां गिरा जयद्रथ का सिर
भगवान श्रीकृष्ण के निर्देश के अनुसार, अर्जुन ने बाण चलाकर जयद्रथ के सिर को धड़ से अलग कर दिया। उसका सिर सीधा उसके पिता वृद्धक्षत्र की गोद में जाकर गिरा, जो उस समय तपस्या कर रहे थे। जयद्रथ के पिता चौंककर उठे, तो उसकी गोद में से सिर जमीन पर गिर पड़ा और वरदान के अनुसार सिर के जमीन पर गिरते ही वृद्धक्षत्र के सिर के भी सौ टुकड़े हो गए। इस तरह अर्जुन की प्रतिज्ञा पूरी हुई।
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