शनि की क्रूर दृष्टि से कैसे कटा था भगवान गणेश का सिर? ब्रह्म वैवर्त पुराण का ये सच कोई नहीं बताता
अक्सर हम सुनते हैं कि भगवान शिव ने गणेश जी का मस्तक काटा था, लेकिन 'ब्रह्म वैवर्त पुराण' की कथा कुछ और ही कहती है। यहां पढ़ें आखिर क्यों शनि देव की एक ...और पढ़ें

गणेश जी को कैसे मिला हाथी का मुख? (Image Source: AI-Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। अक्सर हम सुनते हैं कि भगवान शिव ने क्रोध में आकर बालक गणेश का सिर काट दिया था। लेकिन, ब्रह्मवैवर्त पुराण के 'गणपति खण्ड' में एक ऐसी कथा मिलती है जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। इस कथा के अनुसार, गणेश जी का मस्तक कटने के पीछे भगवान शिव नहीं, बल्कि शनि देव की क्रूर दृष्टि थी।
कथा के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान विष्णु को पुत्र रूप में पाने के लिए 'पुण्यक' व्रत किया था। इसके प्रभाव से श्रीहरि ने बालक के रूप में उनके घर जन्म लिया। पूरे कैलाश में उत्सव का माहौल था। सभी देवी-देवता, गंधर्व और ऋषि-मुनि बालक को आशीर्वाद देने पहुंचे। शनि देव भी वहां आए, लेकिन वे अपनी गर्दन झुकाए खड़े थे और बालक की ओर देख भी नहीं रहे थे।
जब माता पार्वती ने किया मुख देखने का आग्रह
माता पार्वती ने जब शनि देव को इस तरह खड़ा देखा, तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा, "शनि देव, आप मेरे पुत्र को देखकर प्रसन्न क्यों नहीं हैं? आप उसकी ओर देख क्यों नहीं रहे?"
शनि देव ने विनम्रता से उत्तर दिया, "माता, मुझे श्राप है कि मेरी दृष्टि जिस पर भी पड़ेगी, उसका सर्वनाश हो जाएगा। इसलिए मैं बालक के अनिष्ट के डर से उसे नहीं देख रहा हूं।"
लेकिन, पार्वती माता को लगा कि उनके पुत्र का रक्षक स्वयं भगवान शिव और विष्णु हैं, तो शनि की दृष्टि क्या बिगाड़ लेगी? उन्होंने आग्रह किया और शनि देव को बालक को देखने का आदेश दिया।
शनिदेव की क्रूर दृष्टि
जैसे ही शनि देव ने अपनी एक आंख से बालक गणेश के सुंदर मुख को देखा, उनकी शापित दृष्टि का प्रभाव शुरू हो गया। देखते ही देखते बालक गणेश का मस्तक धड़ से अलग हो गया और अंतरिक्ष में विलीन होकर सीधे 'गोलोक' (भगवान कृष्ण का धाम) चला गया। माता पार्वती यह भयानक दृश्य देखकर मूर्छित होकर गिर पड़ीं।
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भगवान विष्णु की सहायता और गजमुख का जन्म
कैलाश पर हाहाकार मच गया। तब स्थिति को संभालने के लिए भगवान विष्णु तुरंत अपने गरुड़ पर सवार होकर उत्तर दिशा की ओर निकले। उन्हें पुष्पभद्रा नदी के तट पर एक हथिनी सोती हुई मिली, जिसका मुख उत्तर की ओर था। विष्णु जी ने उस हथिनी के बच्चे का मस्तक काटा और उसे लेकर कैलाश पहुंचे।
उन्होंने उस मस्तक को गणेश जी के धड़ पर रखकर उन्हें जीवित किया। इस प्रकार, शनि देव की दृष्टि के कारण गणेश जी को हाथी का मुख मिला और वे 'गजमुख' कहलाए।
यह कथा ब्रह्मवैवर्त पुराण के 'गणपति खण्ड' (अध्याय 9-12) में विस्तार से दी गई है। यह शिव महापुराण की कथा से भिन्न है, जो हमें बताती है कि धर्म ग्रंथों में एक ही घटना के पीछे कई आध्यात्मिक और ज्योतिषीय कारण छिपे होते हैं।
क्या कहता है शिवपुराण?
वहीं, शिवपुराण की प्रसिद्ध कथा कहती है कि द्वार पर पहरा दे रहे बालक गणेश और भगवान शिव के बीच भीषण युद्ध हुआ था। माता पार्वती की आज्ञा का पालन कर रहे गणेश जी ने जब शिवजी का मार्ग रोका, तो क्रोधवश शिवजी ने उनका मस्तक काट दिया। हालांकि, बाद में देवी पार्वती को शांत करने के लिए शिवजी ने हाथी का सिर लगाकर उन्हें 'गजमुख' रूप में पुनर्जीवित किया।
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