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पुत्र न होने पर कौन कर सकता है अंतिम संस्कार, पढ़ें क्या कहता है शास्त्र?

Published: Thu, 30 Apr 2026 03:55 PM (IST)

गरुड़ पुराण के अनुसार, पुत्र न होने की स्थिति में अंतिम संस्कार करने का अधिकार किसे है? आइए इस आर्टिकल में जानते हैं।

Garuda Purana: पुत्र के बिना किसे है मुखाग्नि देने का अधिकार?

Garuda Purana: पुत्र के बिना किसे है मुखाग्नि देने का अधिकार? 

HighLights

  1. पुत्र नहीं है तो बेटी भी मुखाग्नि दे सकती है

  2. गरुड़ पुराण में अंतिम संस्कार के बारे में बताया गया है

  3. पत्नी भी कर सकती है अंतिम संस्कार 

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में 'सोलह संस्कारों' का विशेष महत्व है, जिनमें अंतिम संस्कार को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विधि-विधान से किए गए अंतिम संस्कार और पिंडदान से ही आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है और वह 'प्रेत योनि' से मुक्त होकर पितृ लोक में स्थान पाती है। आमतौर पर यह माना जाता है कि मुखाग्नि देने का अधिकार केवल पुत्र को ही है, लेकिन क्या शास्त्र में भी ऐसा है आइए यहां जानते हैं।

पुत्र न होने पर कौन-कौन कर सकता है अंतिम संस्कार?

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गरुड़ पुराण के अनुसार, पुत्र न होने पर मुखाग्नि और पिंडदान का अधिकार इन लोगों को मिलता है -

  • पौत्र या प्रपौत्र - अगर पुत्र नहीं है, तो पुत्र का पुत्र (पौत्र) या उसका पुत्र (प्रपौत्र) यह अंतिम संस्कार कर सकता है।
  • पत्नी - पति के देहावसान पर अगर पुत्र न हो, तो पत्नी को मुखाग्नि देने और श्राद्ध करने का पूरा अधिकार है।
  • पुत्री और उसका पुत्र - आज के समय में बेटियां भी मुखाग्नि दे रही हैं। शास्त्र कहते हैं कि पुत्र न होने पर पुत्री या उसका पुत्र (नाती) अंतिम संस्कार कर सकता है।
  • भाई और भतीजे - अगर सगा भाई हो या उसका पुत्र (भतीजा) हो, तो वे भी इस परंपरा को पूरा कर सकते हैं।
  • शिष्य या मित्र - अगर परिवार में कोई भी पुरुष या महिला सदस्य न हो, तो मृतक का शिष्य या कोई दोस्त भी अंतिम क्रिया कर सकता है।

क्या बेटियां दे सकती हैं मुखाग्नि?

पहले बेटियों को श्मशान जाने से रोका जाता था, लेकिन धर्मशास्त्रों में कहीं भी बेटियों द्वारा अंतिम संस्कार किए जाने पर रोक नहीं है। रामायण और अन्य पुराणों में भी महिलाओं द्वारा पितृ पूजन किए जाने का वर्णन है। अगर किसी व्यक्ति को सिर्फ बेटी है, तो उसकी बेटी पूर्ण श्रद्धा के साथ मुखाग्नि दे सकती है और यह उतना ही सही है जितना एक पुत्र द्वारा किया गया अंतिम संस्कार।

पिंडदान और तर्पण है जरूरी

शास्त्रों के अनुसार, आत्मा की शांति के लिए उसका पिंडदान और तर्पण बेहद जरूरी है। अगर कोई दूर का रिश्तेदार भी शास्त्र विधि से अंतिम क्रिया करता है, तो आत्मा को शांति मिलती है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।

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