पूजा में आरती हमेशा 3, 5 या 7 की संख्या में ही क्यों की जाती है, इसके धार्मिक और शास्त्रीय नियम क्या है?
हिंदू धर्म में आरती हमेशा विषम संख्या में करने की परंपरा क्यों है। इसके पीछे छिपे धार्मिक नियमों, आध्यात्मिक कारणों को पढ़िए।

विषम संख्या में आरती करने की परंपरा का महत्व (AI-Generated Image)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में किसी भी पूजा-पाठ, कथा या धार्मिक अनुष्ठान का समापन आरती के बिना अधूरा माना जाता है। आपने अक्सर घर या मंदिरों में लोगों को कहते सुना होगा कि आरती हमेशा 3, 5, 7 या 11 बार ही घुमानी चाहिए। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसे 2, 4 या 6 जैसी सम संख्याओं (Even Numbers) में क्यों नहीं उतारा जाता?
इसके पीछे केवल लोक परंपरा नहीं, बल्कि गहरा शास्त्रीय और आध्यात्मिक रहस्य छिपा है। आइए इस आर्टिकल के जरिए समझते हैं इसके पीछे की वजह।
पादयोश्चतुरुद्भूतं नाभौ द्वौ मुखमण्डले।
एकं तु वदने कुर्यात् सर्वगात्रेषु सप्त च॥
हिंदू धर्म के हरिभक्तिविलास ग्रंथ में वर्णित इस श्लो का अर्थ है-
पादयोश्चतुरुद्भूतं: भगवान के श्रीचरणों (पैर) में 4 बार आरती की लौ घुमाएं।
नाभौ द्वौ: भगवान की नाभि के समक्ष 2 बार दीपक घुमाएं।
मुखमण्डले / एकं तु वदने: भगवान के मुखारविंद (चेहरे) पर 1 बार आरती घुमाएं।
सर्वगात्रेषु सप्त च: भगवान के संपूर्ण शरीर (सिर से पैर तक) पर 7 बार दीपक घुमाएं।

(AI-Generated Image)
1. त्रिदेव और पंचतत्व का प्रतीक
सनातन परंपरा में विषम संख्याओं का सीधा संबंध ब्रह्मांडीय ऊर्जा से माना गया है:
संख्या 3: यह संख्या त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) का प्रतीक है। इसके अलावा यह प्रकृति के तीन गुणों- सत्व, रज और तम को दर्शाती है।
संख्या 5: हमारा शरीर और पूरा संसार पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) से मिलकर बना है। आरती में इस्तेमाल होने वाला 'पंचदीप' इन्हीं पांचों तत्वों को शांत और संतुलित करने के लिए जलाया जाता है।
संख्या 7: 7 नंबर हमारे शरीर के 7 मुख्य ऊर्जा चक्रों, 7 ऋषियों (सप्तर्षि) और 7 लोकों से जुड़ी है। 7 बार आरती घुमाने का तात्पर्य इसी से है कि व्यक्ति के अंदर सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है।
2. गतिशीलता और सकारात्मक ऊर्जा
अंकशास्त्र के अनुसार, सम संख्याएं यानी 2, 4, 6 ठहराव और संतुलन का प्रतीक मानाी जाती हैं। जबकि विषम संख्याएं यानी 3, 5, 7 गतिशीलता, निरंतरता और आगे बढ़ने की ऊर्जा का संकेत देती हैं। भक्ति कभी रुकती नहीं, वह हमेशा ईश्वर की ओर बढ़ती रहती है। इसलिए, विषम संख्या में आरती करने से वातावरण की नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है और घर में शुभता आती है।
3. आरती उतारने का शास्त्रीय क्रम
पुराणों में भी आरती उतारने का एक विशेष तरीका बताया गया है, जो खुद विषम संख्या पर आधारित है। इसके अलावा पुराणों में आरती ॐ के आकार में करने के पीछे की वजह भी बताई गई है:
- भगवान के चरणों की तरफ 4 बार
- नाभि के पास 2 बार
- प्रभु के मुखमंडल के सामने 1 बार
- अंत में भगवान के पूरे स्वरूप पर 7 बार
यह पूरा क्रम कुल 14 बार की प्रक्रिया से गुजरते हुए आखिर में 7 के विषम अंक पर जाकर पूरा फल प्रदान देता है।
यह भी पढ़ें- आरती लेने के बाद हाथों को आंखों और सिर पर क्यों लगाया जाता है? जानिए इसके धार्मिक कारण
यह भी पढ़ें- किसी भी आरती के बाद 'कर्पूर गौरम' मंत्र क्यों पढ़ा जाता है, इसका महत्व क्या है?
अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।
