हिंदू धर्म में केले और नारियल को क्यों माना जाता है 'पवित्र फल', इस वजह से बनता है पूजा का हिस्सा
पूजा-पाठ में नारियल और केले का विशेष महत्व है। इन्हें पूजा में शामिल करने के पीछे एक धार्मिक महत्व छिपा हुआ है। ...और पढ़ें
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पूजा-पाठ में नारियल और केले का विशेष महत्व है (Picture Credit- AI Generated)
HighLights
नारियल और केले को माना जाता है शुद्ध फल
हर पूजा-पाठ में किया जाता है इनका इस्तेमाल
नारियल, अहंकार त्याग और केला बलिदान का प्रतीक है
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। आपने गौर किया होगा कि किसी भी पूजा-पाठ में नारियल और केले का खासतौर से इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन क्या आप इसका कारण जानते हैं? पूजा में नारियल और केले का इस्तेमाल होना कोई आम बात नहीं है, बल्कि इसके पीछे बड़ी ही खास वजह मिलती है, जिसके बारे में आज हम आपको बताने जा रहे हैं।
यह है असली कारण
हिंदू धर्म में नारियल और केले को सबसे शुद्ध और पवित्र फल माना जाता है, क्योंकि इन्हें 'जूठे' बीज से नहीं उगाया जा सकता। उदाहरण के तौर पर अन्य फल जैसे जामुन, आम, सेब आदि बीज से उत्पन्न होते हैं। अगर कोई व्यक्ति इन्हें खाकर इनका जूठा बीज फेंक देता है, तो यह उग जाते हैं।
वहीं केला और नारियल दो ऐसे फल हैं, जिन्हें खाकर फेंक देने पर ये दोबारा से नहीं उग सकते। यानी यह किसी के जूठे बीज से नहीं उगते। इसलिए पवित्रता बनाए रखने की दृष्टि से पूजा-पाठ में इनका उपयोग किया जाता है और इन्हें ईश्वर के लिए शुद्ध भोग माना जाता है।
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(Picture Credit: Freepik)
ऋग्वेद में भी मिलता है उल्लेख
नारियल को श्रीफल भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है 'लक्ष्मी जी का फल'। श्रीफल यानी नारियल का संबंध धन की देवी से माना गया है। वहीं इस फल की तीन आंखें, त्रिनेत्र शिव जी का प्रतीक भी मानी गई हैं। वहीं ब्रह्मवैवर्त पुराण में भगवान विष्णु की पूजा में केले का भोग लगाने का विशेष महत्व बताया गया है।
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इन दोनों फलों का उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है, जो सबसे प्राचीन ग्रंथ है। इन दोनों ही फलों की उपज भारत की मानी जाती है। इसलिए भी सदियों से पूजा में नारियल और केला अर्पित करने की परम्परा चली आ रही है।

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देते हैं ये संकेत
नारियल के बाहर की सख्त परत को अहंकार के रूप में देखा जाता है। पूजा में साबुत नारियल अर्पित करने के बाद इसे तोड़ा जाता है। ऐसे में पूजा में नारियल अर्पित करने का अर्थ है कि हम अपने बाहरी अंहकार को तोड़कर भगवान के चरणों में अर्पित कर रहे हैं। वहीं केले का पेड़ जीवन में सिर्फ एक ही बार फल देता है। जब वह मर जाता है, तो उसमें नई कोंपलें आ जाती हैं। इस प्रकार केले का पेड़ त्याग का एक बेहतरीन उदाहरण है।
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