आखिर सावन में महादेव का जलाभिषेक क्यों जरूरी? समुद्र मंथन से क्या है इसका कनेक्शन
सावन में महादेव का जलाभिषेक हलाहल विष पीने की पौराणिक कथा से जुड़ा है, जब देवताओं ने शिव के गले की जलन शांत करने के लिए शीतल जल चढ़ाया था। समुद्र मंथन ...और पढ़ें
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शिवजी ने क्यों पिया था हलाहल विष? (Picture Credits- AI Image)

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जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। सावन का महीना भगवान शिव को अधिक प्रिय है। इस माह में भगवान शिव की विशेष पूजा-अर्चना करने का विधान है। साथ ही विशेष चीजों का दान किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, सावन में महादेव की साधना करने से साधक को सभी भय से छुटकारा मिलता है और जीवन में सुख-शांति का वास होता है।
सावन में शिवलिंग का जलाभिषेक भी किया जाता है। इसका संबंध हलाहल विष से है, जिसे समुद्र मंथन के दौरान निकले हलाहल विष पीकर भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा की थी। ऐसे में आइए इस आर्टिकल में आपको विस्तार से बताते हैं कि हलाहल विष की कथा और इसका सावन के महीने से क्या कनेक्शन है।
सावन में हुआ समुद्र मंथन?
पौराणिक कथा के अनुसार, सावन के महीने में असुरों और देवताओं ने समुद्र मंथन शुरू किया, तो समुद्र मंथन के दौरान हलाहल नाम का विष निकला। इस विष की ज्वाला से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। हलाहल विष अधिक शक्तिशाली था। इस विष की एक बूंद से सृष्टि नष्ट हो सकती थी। इसी वजह से असुरों और देवताओं के बीच भय का माहौल था। इस दौरान देवता और असुर मदद के लिए भगवान शिव की शरण में पहुंचे।
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देवता और असुर ने महादेव से सृष्टि को विनाश से बचाने के लिए प्रार्थना की। इसके बाद भगवान शिव ने हलाहल विष को पी लिया। विष के भयंकर प्रभाव की वजह से भगवन शिव का गला नीला पड़ गया। महादेव ने उस विष को गले में ही रोक लिया। इसी वजह से भगवान शिव को नीलकंठ कहा जाता है।
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सावन में क्यों जरूरी है जलाभिषेक?
पौराणिक कथा के अनुसार, जब विष के प्रभाव की वजह से भगवान शिव का गले में जलन होने लगी, तो सभी देवी-देवताओं ने विष का प्रभाव कम करने से शीतल जल से जलाभिषेक किया। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी वजह से सावन के महीने में भगवान शिव का जलाभिषेक का अधिक महत्व है।
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क्यों हुआ समुद्र मंथन?
पौराणिक कथा के अनुसार, अमृत की प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन हुआ था, जिसे पीकर देवता अमर और शक्तिशाली बनना चाहते थे।
श्रीमद् भागवत पुराण में मिलता है वर्णन
श्रीमद् भागवत पुराण के 8वें स्कंध में अध्याय 5 से लेकर अध्याय 12 तक समुद्र मंथन का वर्णन मिलता है।
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