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हलषष्ठी के दिन क्यों नहीं चलाया जाता है खेतों में हल? बलराम जयंती और इस परंपरा के संबंध में पढ़ें

Updated: Tue, 01 Sep 2026 11:41 AM (IST)

हलषष्ठी का व्रत भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन बलराम ...और पढ़ें

हलषष्ठी पर खेती न करने की परंपरा का महत्व  (Picture Credit: AI Generated)

हलषष्ठी पर खेती न करने की परंपरा का महत्व  (Picture Credit: AI Generated)

HighLights

  1. हलषष्ठी भगवान बलराम के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है।

  2. बलराम जी के सम्मान में इस दिन हल नहीं चलाया जाता।

  3. हल बलराम की पहचान, विकास और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक है।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म के कुछ विशेष त्योहारों में से एक हलषष्टी का व्रत होता है। इस दिन को श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है।

बलराम जी जिन्हें बलदेव और हलधर के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में भगवान कृष्ण के बड़े भाई और आदि शेष के दिव्य अवतार के रूप में पूजे जाते हैं। आदि शेष को उन ब्रह्मांडीय सर्प का दर्जा मिला है जो हमेशा भगवान विष्णु की सेवा करते हैं।

अपनी अपार शक्ति, धर्म के प्रति अटूट निष्ठा और अपने प्रतीक 'हल' के लिए मशहूर बलराम, भागवत पुराण और महाभारत में एक अहम भूमिका निभाते हैं। उन्हीं के अवतरण दिवस पर उन्हें सम्मान देने के लिए और बच्चों की अच्छी सेहत की कामना में हलषष्ठी व्रत रखा जाता है।

इस साल यह पर्व 02 सितंबर को मनाया जाएगा। इस दिन को लेकर कई मान्यताएं और नियम हैं जिनका पालन करना जरूरी है। इन्हीं में से एक परंपरा है हलषष्ठी के दिन हल न चलाने की। आइए आपको बताते हैं इसके पीछे के कारण क्या हैं और इसके बारे में पुराण क्या कहते हैं?

हल को माना जाता है बलराम जी की पहचान

बलराम जी की सबसे बड़ी पहचान उनके हल को माना जाता है, जिसके कारण उन्हें 'हलधर' यानी 'हल धारण करने वाला' कहा जाता है। खेती के लिए आवश्यक वस्तु से कहीं ज्यादा, हल को विकास का प्रतीक माना जाता है।

हल का मुख्य उद्देश्य फसल के लिए धरती को तैयार करना, बाधाओं को दूर करना, समृद्धि को बढ़ावा देना और अनुशासन व सही कार्यों के माध्यम से मन को आध्यात्मिक रूप से विकसित करना है। बलराम जी के स्वरूप को हमेशा से ही हल के साथ दिखाया जाता है और यही उनकी सबसे बड़ी पहचान है।

बलराम जी के सम्मान में नहीं चलाया जाता है हल

हलषष्ठी के दिन बलराम जी को सम्मान देने के लिए हल की पूजा की जाती है और इस दिन न तो खेतों में हल चलता है और न ही खेतों में हल से उगाया गया कोई अनाज या फल, सब्जी आदि खाई जाती है। चूंकि बलराम जी को हलधर कहा जाता है, इसलिए हलषष्ठी पर हल न चलाने को उनका सम्मान करना माना जाता है।

इस दिन खेतों में हल की भी पूजा की जाती है और बलराम जी से घर की समृद्धि का आशीर्वाद लिया जाता है। यही नहीं हलषष्ठी के दिन खेती या हल चलाने से जुड़े सभी कार्य वर्जित माने जाते हैं और व्रत रखने वाली महिलाएं इस दिन हल से जोती गई भूमि पर उगने वाले अन्न या सब्जियां भी नहीं खाती हैं।

पुराणों में मिलता है बलराम जी की महिमा का बखान

भागवत पुराण में बलराम को कृष्ण के बड़े भाई और अनंत शेष के धरती पर अवतार के रूप में दिखाया गया है, जो कृष्ण के साथ हमेशा मौजूद रहते हैं। बलराम जी को हमेशा भगवान श्री कृष्ण के पहले पूजा जाता है और इसी वजह से जन्माष्टमी के पहले हलछठ मनाई जाती है। यही नहीं बलराम जी की पूजा बलभद्र के रूप में, भगवान जगन्नाथ और देवी सुभद्रा के साथ की जाती है। मुख्य रूप से हलषष्ठी के दिन बलराम जी की पूजा विधि-विधान के साथ की जाती है।

कृष्ण जी के बड़े भाई बलराम जी के अवतरण दिवस को पूरे देश में हलषष्ठी के रूप में मनाया जाता है और इस दिन उनके सम्मान में ही खेतों में हल चलाने से मना किया जाता है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।