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मां लक्ष्मी का वास या छिपी है कोई बड़ी वजह? घर के आंगन में रंगोली बनाने की सदियों पुरानी परंपरा का सच

Published: Wed, 26 Aug 2026 01:01 PM (GMT+05:30)

घर के मुख्य द्वार और आंगन में रंगोली बनाना सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि सुख-समृद्धि का प्रतीक है। जानें रंगोली का धार्मिक महत्व और सही नियम।

रंगोली का धार्मिक महत्व (AI-Generated Image)

रंगोली का धार्मिक महत्व (AI-Generated Image)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय संस्कृति और हिंदु धर्म में किसी भी त्योहार या मांगलिक कार्य पर घर के मुख्य द्वार और आंगन में रंगोली बनाने की परंपरा सदियों पुरानी चली आ रही है। दीपावाली हो या नवरात्र हो या फिर कोई भी शादी-विवाह जैसे शुभ अवसर, रंगोली बनाना केवल घर की सुंदरता बढ़ाने का तरीका नहीं, बल्कि घर में आने वाली सुख-समृद्धि और सकारात्मकता से जोड़कर भी देखा जाता है।

देवी लक्ष्मी के आगमन का प्रतीक

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, घर के आंगन में रंगोली को धन की देवी मां लक्ष्मी के स्वागत का प्रतीक माना गया है। ऐसा कहा जाता है कि जिस घर का मुख्य द्वार साफ-सुथरा होता है, उस घर में लक्ष्मी का वास होता है। साथ ही, जहां सुंदर रंगों से रंगोली सजाने की परंपरा है, वहां भी मां लक्ष्मी सबसे पहले प्रवेश करती हैं। यही कारण है कि दिवाली हो या कोई भी विशेष दिन द्वार या आंगन में रंगोली जरूर बनानी चाहिए।

सही स्थान का महत्व

शास्त्रों और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रंगोली बनाने के लिए हल्दी, कुमकुम, पिसे हुए चावल का आटा, ताजे फूलों की पंखुड़ियां और प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल करना बेहद शुभ माना जाता है। ये सभी सामान पर्यावरण के हिसाब से सही होते हैं और धार्मिक दृष्टि से भी शुभ और पवित्र माने जाते हैं।

रंगोली हमेशा घर के मुख्य द्वार, आंगन या पूजा घर के ठीक सामने बनानी चाहिए। लोक मान्यताओं के अनुसार, सुबह स्नान के बाद स्वच्छ मन से रंगोली बनाना फलदायी होता है। वहीं, त्योहारों के दिन शाम को दीपक जलाने से पहले रंगोली पूरी कर लेनी चाहिए।

शुभ डिजाइनों का सकारात्मक प्रभाव

अगर आप रंगोली में बनाए जाने वाले डिजाइनों कमल का फूल, स्वस्तिक, ॐ, शुभ-लाभ, दीपक और कलश जैसे चिह्न बनाते हैं तो इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इस तरह के डिजाइन घर के वातावरण से नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर मानसिक शांति देते हैं। इसके अलावा, रंगोली बनाने का एक वैज्ञानिक पहलू भी है। रंगोली बनाते समय हाथों की सूक्ष्म गतिविधियां और रंगों का चयन हमारी एकाग्रता को बढ़ाता है।

आज भले ही समय के साथ रंगोली बनाने के तरीके बदल गए हों, लेकिन इसकी सांस्कृतिक और धार्मिक महत्ता आज भी उतनी ही अटूट बनी हुई है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।

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