नारद पुराण के अनुसार पूजा के समय मन में आते हैं ये विचार, तो नहीं मिलता फल
नारद पुराण के अनुसार, पूजा के समय मन में आने वाले भाव उसके फल को निर्धारित करते हैं। लोभ, भय, अज्ञानता या दूसरों के कहने पर की गई पूजा का कोई फल नहीं ...और पढ़ें

पूजा में इन विचारों से बचें (Picture Credit- AI Generated)
HighLights
पूजा का फल मन के भावों पर निर्भर करता है।
लोभ, भय, अज्ञानता से की गई पूजा निष्फल होती है।
सच्ची श्रद्धा और अच्छे कर्म ही ईश्वर की असली पूजा।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हमारे जीवन में इस बात का बहुत प्रभाव पड़ता है कि हम किस भाव से ईश्वर को याद कर रहे हैं। बेशक नियम से पूजा-पाठ करते हों, मगर उसका फल इस बात पर तय होता है कि हमने किस भाव से ईश्वर की आराधना की है। नारद पुराण में इसे बहुत ही विस्तार से बताया गया है।
हमारे मन में निरंतर भाव आते और जाते रहते हैं। पूजा करते वक्त हम क्या सोच रहे हैं, यह बहुत महत्वपूर्ण है। चलिए आपको बताते हैं कि पूजा के वक्त क्या सोचने पर नहीं मिलते हैं फल।
किसी चीज का लोभ
लोभ बहुत ही बुरा भाव होता है । यह मनुष्य से बहुत सारे अपराध करा देता है। पूजा के वक्त यदि हमारे मन किसी चीज को पा लेने का लालच होगा, तो वह पूजा कभी भी सफल नहीं होगी। पूजा के वक्त मनुष्य को पूरी तरह से खुद को ईश्वर को समर्पित कर देना चाहिए। मगर लोभ ऐसा नहीं होने देता है।
किसी बात का भय नहीं होना चाहिए
कोई अपराध करके डर के भाव से जब कोई पूजा करता है, तो उस पूजा का भी कोई फल प्राप्त नहीं होता है। इस तरह की पूजा को अपवित्र माना जाता है। हो सकता है इससे आपका मन शांत हो जाए, मगर ईश्वर को याद करने का यह तरीका उन्हें क्रोध दिलाता है।
अज्ञानता के भाव से न करें पूजा
पूजा करने की एक विधि होती है। उस विधि से आप अगर पूजा नहीं करते हैं, तो आपको उसका फल नहीं मिलता है। कई बार लोग केवल कोरम पूरा करने के लिए पूजा करने बैठ जाते हैं, मगर इस तरह की पूजा से कुछ भी हासिल नहीं होता है। नारद पुराण में कहा गया है ईश्वर को जब याद करो सच्चे मन से याद करो और यही उसकी सबसे बड़ी पूजा है।
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दूसरों के कहने पर पूजा
किसी दूसरे के कहने पर पूजा करना भी बेकार है। यदि आप ऐसा करते हैं, तो पूजा के दौरान आपको बोझ का भाव महसूस होगा। पूजा करना आपको एक काम लगेगा और आप इससे पीछा छुड़ाने के लिए जल्दबाजी करेंगे। जबकि पूजा का अर्थ ही ध्यान करना। जब हम पूरे मन से खुश होकर ईश्वर को याद करते हैं और उसे धन्यवाद कहते हैं, तो वही असली पूजा कहलाती है।
अत: नियमित पूजा करने से कोई फल प्राप्त नहीं होता है, यह केवल एक आदत होती है। पूजा का अर्थ है ईश्वर को ध्यान में रखकर अच्छे कर्म करना और फल भी आपको आपके कर्मों का ही मिलता है। तो इसलिए जब पूजा करने पूरी चित्त से करें, वरना न करें।
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