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    धर्म के नाम पर अहंकार नष्ट करती है आध्यात्मिक शक्ति: श्रीरामचरितमानस से समझें ईश्वर की एकता का सार

    Updated: Mon, 06 Jul 2026 12:59 PM (IST)

    ईश्वर सर्वव्यापक है, लेकिन धर्म में अहंकार आ जाने के कारण हम अविभाज्य का विभाजन करने लगते हैं। जिस दिन हम ईश्वर को विभाजक रेखा से बाहर कर देंगे, उसी द ...और पढ़ें

    धर्म के नाम पर अहंकार: आध्यात्मिक शक्ति का क्षरण और ईश्वर की अविभाज्य एकता

    धर्म के नाम पर अहंकार: आध्यात्मिक शक्ति का क्षरण और ईश्वर की अविभाज्य एकता

    स्वामी मैथिलीशरण (संस्थापक अध्यक्ष, श्रीरामकिंकर विचार मिशन)। अगर व्यक्ति का उद्देश्य परस्पर प्रेम और शांति है तो विभाजन गरिमा और मर्यादा भी है। अहंकार धर्म के साथ जुड़कर और भी शक्तिशाली हो जाता है, क्योंकि अर्थ और काम के संदर्भ में वह अपनी सीमा को स्वीकार कर लेने के लिए बाध्य हो जाता है, पर धर्म के साथ जुड़कर वह बिना किसी उपलब्धि और सृजन के भी अत्यधिक प्रतिष्ठा प्राप्त कर लेने के कारण स्वयं को ही ईश्वर के स्थान पर बैठाने का प्रयास कर लेता है। किसी सीमा तक वह सफल भी हो जाता है। यही अहंकार अविभाज्य का विभाजन करता और कराता है।

    ईश्वर किसी भी घेरे में घिरा हुआ बंदी नहीं है, न ही वह किसी को घेरे में बांधता है। संसार में उसके लिए किसी ऐसी रस्सी का निर्माण नहीं हुआ है, जो उसे बांध सके। परम स्वातंत्र्य उसका स्वभाव न होकर उसका स्वरूप है। ईश्वर के द्वारा निर्मित विभाजन अविभाजित ईश्वर की व्यापकता का व्यावहारिक स्वरूप है, जिसके सहयोग से हम एक-दूसरे को संबोधित कर पाते हैं। किसी को दूर रहकर कहीं से कुछ और कितना मंगवाने का आदेश कर पाते हैं।

    तुलसीकृत श्रीरामचरितमानस में भगवान श्रीराम के भक्त पिता महाराज दशरथ और श्रीसीता जी के ज्ञानी पिता महाराज जनक के चरित्र और स्वभाव के इस अविभाज्य के विभाजन प्रेममयता तथा एकरूपता का सर्वोच्च कोटि का व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत किया गया है। व्यवहार विभाजित के बिना नहीं संभव है, ज्ञान में विभाजन होता ही नहीं है, किंतु जब दोनों का लक्ष्य अपने को पूर्ण करना होगा तो द्वितीय की विशेषता को स्वीकार और शिरोधार्य किए बिना वह सुख मिलना संभव ही नहीं है कि किसी को परम सुख की प्राप्ति हो जाए।

    जनकपुर में भगवान श्रीराम-सीता के विवाह के अवसर पर ज्ञानी राजा जनक ने दशरथ जी, गुरु वशिष्ठ, विश्वामित्र एवं श्रीराम के साथ भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न जी के चरणों का प्रक्षालन किया। ये ज्ञानी की निरहंकारिता है, पर गोस्वामी तुलसीदास जी की अलौकिक दृष्टि सब कुछ देख और समझ लेती है। साथ ही प्रतिपादन भी कर देती है। गोस्वामी जी ने लिखा कि जनक ने श्रीराम के साथ तीनों भाइयों को राम के समान मानकर ही उनके चरणों का प्रक्षालन किया।

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    धोए जनक अवधपति चरना। सीलु स्नेह जाइ नहिं बरना।।
    बहुरि राम पद पंकज धोए।जे हर हृदय कमल महुं गोए।।
    तीनिउ भाइ राम सम जानी। धोए चरन जनक निज पानी।।

    यह तो ज्ञानी की सम बुद्धि है, पर जब सब लोगों को, बरातियों, मंत्रियों, गुरुओं तथा अन्य राजाओं को बैठने की व्यवस्था की तो वही समान बुद्धि वाले ज्ञानी जनक ने सबकी व्यवस्था एक जैसी न करके विभिन्न प्रकार के आसनों की व्यवस्था की :
    आसन उचित सबहिं नृप दीन्हें। बोलि सूपकारी सब लीन्हें।।

    सबके लिए उचित तथा यथायोग्य बैठने की व्यवस्था। इतना ही नहीं, जब सभा में धनुर्भंग होने जा रहा था तो जनक जी ने देखा कि बहुत भीड़ हो गई है तो वे अपने सुयोग्य शिष्यों को, जो लोक और वेद की मर्यादा जानते थे, को बुलाकर कहा कि आप लोग तुरंत सबके पास जाकर उनका सम्मान करिए और सबको उचित आसन दीजिए :

    तुरत सकल लोगन्ह पहिं जाहू। आसन उचित देहु सब काहू।।

    राजा के दूतों ने उचित शब्द को समुचित अर्थों में समझकर जो यथोचित आसनों की व्यवस्था की, यद्यपि होती तो सब जगह वैसी ही व्यवस्था है, पर हम भाषणों में समानता के नाम पर जो विषमता का शाब्दिक विष उगलते रहते हैं, वह ज्ञानी के देश में प्रजा, सेवक और मंत्री कोई नहीं करते हैं। विभाजन विभाजित बुद्धि कभी नहीं कर सकती है। विभाजन तो वही बुद्धि कर सकती है, जो अविभाज्य राम के प्रति समर्पित है। साथ ही उस विभाजन को वही स्वीकार कर सकता है, जो अविभाजित राम के प्रति मन, वचन, कर्म से अर्पित हो चुका है।

    व्यवस्था के स्वरूप में चार स्तर हैं, पर कहीं विभाजन बुद्धि नहीं है। सबके प्रति समान बुद्धि होकर भी आसन की असमानता में भी हृदय में प्रेम भरा हुआ है। व्यवस्था का वर्णन करते समय तुलसीदास जी लिखते हैं :
    कहि मृदु बचन बिनीत तिन्ह बैठारे नर नारि।

    उत्तम, मध्यम, नीच, लघु निज निज थल अनुरारि।।

    सभा में पधारे लोग अपने-अपने अनुसार नीचे-ऊपर, जहां-तहां स्वयं ही अपनी-अपनी रुचि के अनुसार बैठ गए।
    तुलसी का अपना महत्त्व है, पीपल का अपना, बरगद का अपना स्वरूप और महिमा है, दूब घास की अपनी शोभा और उपयोग है। फल का उपयोग अलग है, धान्य भी महत्त्वपूर्ण है। पुष्प अलग शोभा और सुगंध करते हैं। दशरथ जी जनक जी को पाकर कह रहे हैं कि आपने हमें सब कुछ दे दिया। हम पहले छोटे थे, पर आपको पाकर हम बड़े हो गए। भाव का विनिमय ही ईश्वर का अविभाज्य स्वरूप है और यही ईश्वर का अविभाज्य विभाजन है।

    हम जब तक शांत, प्रसन्न, मध्य में स्थित नहीं होंगे, तब तक या तो आद्य होंगे या अंत होंगे, आद्योपांत नहीं हो सकते। विवेक, भक्ति, ज्ञान की स्थिति ही आद्योपांत और एकरस है। एकरस रहने के लिए सबको स्वीकार करना होता है। सबकी उपयोगिता माननी होती है। सबका उपयोग करना आना चाहिए। जिस दिन समाज अगर ईश्वर को विभाजक रेखा से बाहर कर देगा, उसी दिन से सबकी सीमाएं सुरक्षित होंगी तथा सबको अपनी सीमाओं का ज्ञान होने के कारण सब लोग आपसी राग द्वेष न करके एक-दूसरे के गुणों का विनिमय करेंगे और सब पूर्णता को प्राप्त करेंगे।

    पूर्ण केवल ईश्वर है, शेष सब अपूर्ण हैं। इसी अपूर्णता को स्वीकार कर पूर्ण होने की मात्र एक ही प्रक्रिया है कि हम अपने अहं को सुलाएं और अपने को जगाएं। धर्म का आवरण ओढ़कर अहंकार स्वयं तो ईश्वर की तरह परम शक्तिशाली दिखाई देता है, पर वह हमारी और संसार की समस्त शक्ति, योग्यता, उपलब्धियों को शक्तिहीन कर रहा है। अपने मंदिर, अपनी रसोई, सोने-बैठने के स्थान, खेत, क्यारी सब विभाजित होते हुए भी इसलिए अविभाज्य हैं, क्योंकि सब हमारा है और हमारा अहंकार उससे तुष्ट होता रहता है।

    भेद ज्ञान में भी होता है, भेद भक्ति में भी होता है तथा कर्म में भी भेद ही लक्ष्य को प्राप्त कराता है, किंतु वह भेद भेद न होकर अभेद है। वहां कोई छोटा-बड़ा नहीं है। घर के पूरे भाग में व्यक्ति का प्रेम और अहंकार समान रूप से व्याप्त रहता है। इसलिए उसको अपने पूरे घर से प्रेम होता है।

    ईश्वर संभाव्य नहीं है। वह तो सर्वव्यापक और सर्वांतरात्मा है। छोटा, बड़ा, नया, पुराना... ये सब खंडित शब्द हैं। अखंड का तात्पर्य है, जो न तो खंडित हो और न ही किसी दूसरे के द्वारा खंडित किया जा सके। धर्म के तत्व को न समझ पाने और न धारण कर पाने के कारण मनुष्य ने अपनी ईश्वर प्रदत्त क्षमता का नाश कर दिया। सब लोग अपने अपने आकाश को बड़ा बताने में लगे हैं। हमारी शक्ति सामर्थ्य का अधिकांश भाग अहंकार निगल गया।

    हमें करना केवल यह था कि ईश्वर ने जो दिया है, हम उसका सदुपयोग करते। ईश्वर की जो व्यापकता है, हमें उसे विभाजित नहीं करना चाहिए। अधिकार और सामर्थ्य जब अल्पज्ञ के हाथ में आ जाती है, तो वह अपनी खंडित बुद्धि के द्वारा अखंड के भी खंड कर देता है। गेहूं सबका एक, पृथ्वी सबकी एक, सारे संसाधन और आकाश, वायु, अग्नि एक हैं, तो ईश्वर को अनेक क्यों बना रहे हैं हम?

    अहंकार का कार्य है विभाजन

    जब मन विभाजित है, तो वह ईश्वर को विभाजित ही देखेगा और विभाजित करेगा। बुद्धि और चित्त विभाजित है तो ईश्वर को व्यापक कोई नहीं कर सकता, क्योंकि अहंकार का तो एकमात्र कार्य विभाजन ही है। जो सत्य और तथ्य को कभी भी स्वीकार न कर सके, उसी का नाम है अहंकार। संसार के चित्त की स्थिति जब इस प्रकार का रूप धारण कर लेती है, तब हमारी वृत्ति वृत्ताकार होकर अपने द्वारा निर्मित वृत्त में ही ईश्वर को देखती है, जिसका नाम ईश्वर न होकर केवल मात्र अपने अहंकार का कल्पित संसार और उसका आराध्य ईश्वर होता है।

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