तनाव और भागदौड़ से ब्रेक है चातुर्मास: देवशयनी एकादशी पर व्रत के साथ क्रोध और अहंकार का करें त्याग
भगवान विष्णु की योगनिद्रा दिव्य चेतना, आंतरिक स्थिरता और सृजनात्मक मौन का प्रतीक है। इसका संदेश स्पष्ट है कि जीवन की भाग-दौड़ से समय निकालकर स्वयं का ...और पढ़ें
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देवशयनी एकादशी और चातुर्मास: तनाव से मुक्ति और आत्मिक शुद्धि का पर्व
डॉ. प्रणव पण्ड्या (प्रमुख, अखिल विश्व गायत्री परिवार)। भारतीय संस्कृति में पर्व और व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं, बल्कि वे जीवन को दिशा देने वाले आध्यात्मिक और सामाजिक संदेश भी समेटे हुए हैं। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी ऐसा ही एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिससे चार माह तक चलने वाले चातुर्मास का शुभारंभ होता है। हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी अर्थात देवोत्थान एकादशी के दिन पुनः जाग्रत होते हैं। इन चार महीनों को आत्मसंयम, साधना और आत्मशुद्धि का श्रेष्ठ समय माना गया है।
धार्मिक मान्यता है कि भगवान विष्णु की योगनिद्रा के दौरान भी उनका सूक्ष्म स्वरूप संपूर्ण सृष्टि का पालन करता रहता है। उनकी योगनिद्रा सामान्य निद्रा नहीं, बल्कि दिव्य चेतना, आंतरिक स्थिरता और सृजनात्मक मौन का प्रतीक है। इसका संदेश स्पष्ट है कि जीवन केवल निरंतर भाग-दौड़ का नाम नहीं, बल्कि समय-समय पर स्वयं के भीतर झांककर अपने विचारों, भावनाओं और कर्मों का मूल्यांकन करना भी आवश्यक है। जब मनुष्य बाहरी आकर्षणों और मानसिक कोलाहल से कुछ दूरी बनाता है, तभी वह अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव कर पाता है। इसलिए देवशयनी एकादशी आत्ममंथन और आत्मविकास का भी पर्व है।
चातुर्मास का समय वर्षा ऋतु के साथ आता है। प्राचीन काल में वर्षा के कारण लंबी यात्राएं कठिन हो जाती थीं, इसलिए साधु-संत एक स्थान पर निवास कर तप, स्वाध्याय, सत्संग और लोककल्याण के कार्यों में समय व्यतीत करते थे। यह परंपरा धार्मिक व्यवस्था के साथ ही समाज में ज्ञान, नैतिकता और सांस्कृतिक चेतना के प्रसार का प्रभावी माध्यम भी थी। आज भी इन चार महीनों में अनेक धार्मिक संस्थानों में प्रवचन, कथा, भजन, योग, ध्यान और सेवा गतिविधियों का आयोजन किया जाता है।
चातुर्मास का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है- संयम और अनुशासन। इस अवधि में सात्विक भोजन ग्रहण करने, तामसिक पदार्थों का त्याग करने तथा इंद्रियों पर नियंत्रण रखने का विशेष महत्व बताया गया है। आयुर्वेद और स्वास्थ्य विज्ञान की दृष्टि से भी वर्षा ऋतु में हल्का, सुपाच्य और सात्विक भोजन शरीर के लिए लाभकारी माना जाता है। वास्तव में यह भोजन में संयम रखने का नाम ही नहीं है, इसका मूल उद्देश्य मनुष्य के भीतर के दोषों का परिष्कार करना है। क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, अहंकार, असत्य और कटु वचन का त्याग कर करुणा, धैर्य, विनम्रता, सत्यनिष्ठा और सेवा-भाव को अपनाना ही इसकी वास्तविक साधना है। बाहरी व्रत तभी सार्थक होता है, जब उसके साथ विचारों और व्यवहार की शुद्धि भी जुड़ी हो।
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आज का समाज तेज रफ्तार, उपभोक्तावाद और निरंतर प्रतिस्पर्धा के दौर से गुजर रहा है। मानसिक तनाव, असंतोष और संबंधों में बढ़ती दूरियां गंभीर चुनौती बन चुकी हैं। ऐसे समय में देवशयनी एकादशी और चातुर्मास का संदेश पहले से अधिक प्रासंगिक हो जाता है। यह हमें याद दिलाता है कि जीवन का वास्तविक विकास केवल भौतिक उपलब्धियों से नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन, नैतिक मूल्यों और आध्यात्मिक चेतना से भी होता है। प्रतिदिन कुछ समय मौन, ध्यान, प्रार्थना, स्वाध्याय और आत्मचिंतन के लिए निकालना आज की आवश्यकता है।
युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने कहा है कि धर्म का वास्तविक स्वरूप आत्मपरिष्कार और व्यक्तित्व निर्माण है। उनके अनुसार संयम, अनुशासन, सात्विकता और आत्मचिंतन ही मनुष्य को देवत्व की ओर ले जाते हैं। यदि चातुर्मास के इन चार महीनों में हम अपने विचार, व्यवहार और आचरण को अधिक शुद्ध, संवेदनशील और सकारात्मक बनाने का संकल्प लें, तो यही इस पर्व की सच्ची साधना होगी और यही भारतीय संस्कृति का शाश्वत संदेश भी।