श्रावण मास का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व, शिव-उपासना और लोककल्याण का पावन पर्व
श्रावण मास सिखाता है कि विष्णु का पालन, शिव का कल्याण, कृष्ण की धर्मस्थापना, ऋषियों का ज्ञान, नागों के माध्यम से प्रकृति-संरक्षण और रक्षाबंधन का सामाज ...और पढ़ें

श्रावण मास विशेष
प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी, कुलपति, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली। भारतीय कालगणना में प्रत्येक मास का अपना विशिष्ट धार्मिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक महत्व है, किंतु श्रावण मास इन सबमें अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। सामान्यतः इसे भगवान शिव की आराधना का मास माना जाता है, परंतु शास्त्रीय दृष्टि से इसका स्वरूप इससे कहीं अधिक व्यापक और गंभीर है।
‘श्रावण’ नाम का आधार श्रवण नक्षत्र है, और वैदिक ज्योतिष में श्रवण नक्षत्र के अधिदेवता स्वयं भगवान विष्णु माने गए हैं। ‘श्रवण’ का अर्थ केवल नक्षत्र नहीं, अपितु श्रवणम्-ज्ञान का ग्रहण, सत्य का अनुशीलन और धर्म को आत्मसात करना भी है। अतः श्रावण मास वस्तुतः ज्ञान, धर्म, पालन और कल्याण-इन सभी का समन्वित पर्व है। श्रावण में श्रवण भजन व्रत उपासना विशेष फलप्रद मना देते है।
इसी कारण श्रावण मास के आरंभिक चरण में चातुर्मास्य का शुभारंभ होता है। देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु योगनिद्रा में प्रविष्ट होते हैं और आगामी चार मास तप, स्वाध्याय, व्रत, संयम तथा आध्यात्मिक साधना के लिए विशेष रूप से निर्धारित किए गए हैं। भारतीय मनीषा ने वर्षा ऋतु को बाह्य गतिशीलता से अधिक आंतरिक जागरण का समय माना है। यही कारण है कि इस अवधि में ऋषि-मुनि एक स्थान पर निवास कर अध्ययन, अध्यापन और धर्मचर्चा में प्रवृत्त होते थे।
यद्यपि श्रवण नक्षत्र के अधिदेवता भगवान विष्णु हैं, तथापि इस मास में भगवान शिव की उपासना का विशेष विधान है। समुद्रमंथन के समय लोकमंगलार्थ हलाहल विष का पान कर शिव ने संपूर्ण सृष्टि की रक्षा की। अतः श्रावण में किया जाने वाला जलाभिषेक केवल पूजा नहीं, बल्कि लोककल्याण, आत्मशुद्धि और अंत:करण की शीतलता का प्रतीक है। वैदिक श्रीरुद्रम् का यह उद्घोष है, जो शिव को समस्त मंगल एवं कल्याण के अधिष्ठाता के रूप में प्रतिष्ठित करता है -
खबरें और भी
नमः शंभवाय च मयोभवाय च।
नमः शंकराय च मयस्कराय च।
नमः शिवाय च शिवतराय च॥
श्रावण मास का प्रत्येक पर्व भारतीय संस्कृति के किसी शाश्वत मूल्य का प्रतिनिधित्व करता है। नागपंचमी प्रकृति, जैव-विविधता और समस्त प्राणिजगत के प्रति कृतज्ञता का पर्व है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी भी श्रावण या भाद्रपद मास का पर्व है। यह धर्मसंस्थापन, कर्मयोग और दिव्य अवतार की स्मृति का महोत्सव है, जिसकी घोषणा स्वयं श्रीकृष्ण करते हैं-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
श्रावण पूर्णिमा का विशेष महत्व है। इसी दिन श्रावणी (उपाकर्म) संपन्न होती है। वेदाध्ययन करने वाले द्विज नवीन यज्ञोपवीत धारण कर ऋषियों का स्मरण करते हुए पुनः स्वाध्याय का संकल्प लेते हैं। यह भारतीय ज्ञानपरंपरा के नवीनीकरण का अनुपम संस्कार है। इस सप्ताह को भारत सरकार ने संस्कृत सप्ताह के रूप में मनाने का निर्णय किया है। इसी दिन रक्षाबंधन का पावन पर्व भी मनाया जाता है। रक्षा-सूत्र केवल भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक नहीं, बल्कि धर्म, उत्तरदायित्व और परस्पर संरक्षण का वैदिक संकल्प है। इस अवसर पर प्रचलित मंत्र आज भी भारतीय संस्कृति की उसी भावना को व्यक्त करता है—
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षेन् मा चल मा चल॥
श्रावण मास हमें यह सिखाता है कि विष्णु का पालन, शिव का कल्याण, कृष्ण का धर्मस्थापना, ऋषियों का ज्ञान, नागों के माध्यम से प्रकृति-संरक्षण और रक्षाबंधन का सामाजिक उत्तरदायित्व-ये सभी भारतीय संस्कृति के अभिन्न आयाम हैं। श्रावण इन सबको एक सूत्र में पिरोकर हमें धर्म, ज्ञान, करुणा, संयम और लोकमंगल का मार्ग दिखाता है। अतः श्रावण मास केवल व्रतों और पर्वों का क्रम नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन का जीवंत उत्सव है। यह हमें स्मरण कराता है कि जीवन की वास्तविक साधना बाह्य अनुष्ठानों से आगे बढ़कर आत्मशुद्धि, स्वाध्याय, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता, पारिवारिक उत्तरदायित्व और लोककल्याण के संकल्प में निहित है। यही श्रावण का शाश्वत संदेश है और यही भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर भी।
हरिः ॐ। हर हर महादेव। श्रीकृष्णार्पणमस्तु।