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    स्त्री शक्ति का प्रतीक वटसावित्री व्रत: जानें उत्तर और दक्षिण भारत में तिथियों के अंतर का रहस्य

    By Jagran NewsEdited By: Vaishnavi Dwivedi
    Updated: Mon, 11 May 2026 12:17 PM (IST)

    मान्यता है कि वटसावित्री व्रत करने से स्त्री में वह शक्ति आ जाती है कि वह पति को यम के पाश से छुड़ा सकती है। उत्तर और दक्षिण भारत में यह व्रत अलग अलग ...और पढ़ें

    वटसावित्री व्रत 2026: क्या है इस पावन व्रत का विधान?

    वटसावित्री व्रत 2026: क्या है इस पावन व्रत का विधान? 

    प्रो. मुरली मनोहर पाठक कुलपति, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय। भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का मूल स्रोत वेद हैं। वेदों में संसार के अनेक विषयों को मंत्रगत सूत्रशैली में प्रतिपादित किया गया है। वेदों को समझने के लिए पुराण साहित्य का अध्ययन परमावश्यक माना गया है। वेदोक्त सूत्रात्मक शैली के बीजों को कथा साहित्य में नाना रसों से ओतप्रोत कर भगवान बादरायण व्यास ने पुराणों में उपन्यस्त किया है। वटसावित्री व्रत भी पौराणिक कथाओं की शृंखला की एक कड़ी है। उत्तर भारतीय मान्यता के अनुसार, यह व्रत ज्येष्ठ कृष्ण अमावास्या (बरगदाही अमावस्या) को मनाया जाता है, जबकि दक्षिण भारत में इसे ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा को मनाते हैं। इसकी कथा का स्रोत हमें श्री स्कंदमहापुराण के प्रभासखंड (7) के 166वें अध्याय में प्राप्त होता है, जहां स्पष्ट लिखा है -

    ज्येष्ठस्य पूर्णिमायां च तथा चीर्णं व्रतं त्विदम् ।
    माहात्म्यतो{स्य नृपतेश्चक्षुः प्राप्तिरभूत्पुरः।।

    स्कंदपुराणोक्त उक्त वचन के आधार पर ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा को वटसात्रित्री व्रतानुष्ठान का निर्देश प्राप्त होता है, किंतु भविष्यपुराण में वचन प्राप्त होता है:

    अमायां च तथा ज्येष्ठे वटमूले महासती।
    त्रिरात्रेपोषिता नारी विधिना{नेन पूजयेत्।।

    इसके आधार पर ज्येष्ठ कृष्ण अमावास्या को वट सावित्री व्रत करने का विधान प्राप्त होता है। मदनरत्न में ‘पंचदश्यां तथा ज्येष्ठे’ कहकर ज्येष्ठ पूर्णिमा को ही वट सावित्री व्रत का विधान किया गया है। दाक्षिणात्य विद्वद्गण इसी वचन को तथा स्कंदपुराण के वचन को आधार मानकर ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा को वट सावित्री व्रत करने के पक्ष को स्वीकार करते हैं। मैथिल लोग भविष्यपुराणीय वचन को अधिक प्रामाणिक मानते हुए मदनरत्न एवं स्कंदपुराण के वचन पर दृढ़ निश्चय न होकर भविष्यपुराणोक्त काल (ज्येष्ठ कृष्ण अमावास्या) को स्वीकार करते हैं।

    वस्तुतः समस्त उत्तर भारत में ज्येष्ठ कृष्ण अमावास्या को ही वटसावित्री व्रत को मनाया जाता रहा है। अतएव उत्तर भारतीय पंचांगों में ज्येष्ठकृष्ण अमावस्या को ही वटसावित्री व्रत का विधान प्राप्त होता है। ध्यातव्य है कि उत्तर भारतीय पंचांग पूर्णिमांत मास वाले पंचांग हैं तथा दक्षिण भारतीय पंचांग अमांत मास वाले पंचांग होते हैं।

    यद्यपि पंचांगों में यह स्पष्ट देखा जाता है कि शुक्लपक्ष की प्रतिपदा की संख्या एक, द्वितीया की संख्या दो... इस प्रकार पूर्णिमा की संख्या 15 होती है तथा कृष्णपक्ष में प्रतिपदा की संख्या-एक, द्वितीया की- दो... इस प्रकार अमावस्या की संख्या 30 होती है। गणितीय प्रक्रिया के अनुसार 15 संख्या अर्धमास का द्योतक है तथा 30 संख्या मासांत का द्योतक है। यहां स्कंदपुराणोक्त वचन एवं भविष्यपुराणोक्त वचन में पूर्णिमा एवं अमावास्या दोनों तिथियों के उद्धरण प्राप्त होने से यह विषय विवादास्पद हो जाता है, तथापि देशकाल परिस्थिति के अनुसार तिथि, पक्ष एवं मास की स्वीकृति के आधार पर उत्तर भारत में ज्येष्ठ कृष्ण अमावास्या को ही वट सावित्री व्रत मनाए जाने की सर्वाधिक प्रचलित परंपरा रही है और तदनुसार ही यह व्रत अनुष्ठित होता रहा है।

    यह व्रत पति की आयुवृद्धि हेतु किया जाता है। अतः स्त्रियों के लिए विहित है। ज्येष्ठकृष्ण त्रयोदशी को व्रती प्रातःकाल विहित काष्ठ से दंतधावन करके तिल और आंवले के साथ केशों को धोकर, स्नान कर वट वृक्ष को अधिक जल से सिक्त करें तथा ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें। चतुर्दशी को भी स्नान एवं वृक्ष सेचन कर शुद्धान्न भक्षण कर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें। अमावास्या को स्नानादि करके अपने घर के पास स्थित वटवृक्ष के पास आकर पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख होकर सर्वप्रथम वट वृक्ष को जल से सिक्त करते हुए निम्न मंत्र पढ़ें

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    नमो वटमूले स्थितो ब्रह्मा वटमध्ये जनार्दनः।
    वटाग्रे तु शिवं विद्यात् सावित्री व्रतसंयुता।।
    वट! सिंचामि ते मूलं सलिलैरमृतोपमै।

    इस प्रकार वृक्ष में जलसेचन कर पांच बार, सात बार या 108 बार प्रदक्षिणा करते हुए लाल/पीले सूत्र से वट वृक्ष को आवेष्टित करें। आवेष्टन करने के उपरांत नमस्कार करते हुए मंत्र पढे़ं-

    नमो मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे।
    अग्रतः शिवरूपाय वृक्षराज नमो{स्तु ते।।

    नमस्कार करके पूजा स्थान में बैठकर दीप प्रज्वलित कर गणेश एवं गौरी की पूजा कर जल लेकर संकल्प करें। फिर पुष्प, अक्षत लेकर - नमः ब्रह्मणा सह सावित्रि इहागच्छ इह तिष्ठ, इह सुप्रतिष्ठिता वरदा भव मंत्र से ब्रह्मा के साथ सावित्री देवी की प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा करें। तत्पश्चात स्कंदपुराणोक्त प्रभासखंड के 166वें अध्याय में जो कथा है, उसका श्रवण करें। तत्पश्चात विसर्जन कर, दक्षिणादि प्रदान कर प्रतिमा सहित अन्य द्रव्य ब्राह्मण को प्रदान कर उन्हें भोजन कराएं। मान्यता है कि वटसावित्री व्रत के अनुष्ठान से सत्यवान एवं सावित्री की कथा की भांति पत्नी में यह सामर्थ्य आ जाता है कि वह अपने मृत पति को यम पाश से छुड़ाकर भी ले आ सकती है। अतः एव उक्त व्रत का अनुष्ठान प्रत्येक भारतीय नारी द्वारा किए जाने का विधान है।

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