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    अलीगढ़ अपहरण केस: 19 साल बाद पांच दोषियों को उम्रकैद, परिवार को अब भी बेटी का इंतजार

    Updated: Mon, 03 Aug 2026 11:59 AM (IST)

    अलीगढ़ में 19 साल पुराने अपहरण मामले में पांच दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है। पीड़ित परिवार, जिसने न्याय के लिए लंबा संघर्ष किया, आज भी अ ...और पढ़ें

    सांकेतिक तस्वीर।

    सांकेतिक तस्वीर।

    HighLights

    1. 19 साल बाद अलीगढ़ अपहरण मामले में फैसला आया।

    2. पांच दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।

    3. पीड़ित परिवार आज भी अपनी अगवा बेटी का इंतजार कर रहा।

    जागरण संवाददाता, अलीगढ़। 19 साल पहले जिस बेटी को घर से अगवा कर लिया गया था, उसके इंतजार में परिवार की आंखें आज भी टकटकी लगाए हैं। अदालत ने उसके अपहरण के मामले में पांच आरोपितों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। बेटी अब तक नहीं मिली, लेकिन फैसले ने उस परिवार को यह भरोसा जरूर दिया है कि वर्षों का संघर्ष बेकार नहीं गया।

    विजयगढ़ क्षेत्र के एक गांव के परिवार की ये कहानी सिर्फ एक मुकदमे की नहीं, बल्कि गरीबी, संघर्ष और उम्मीद की भी है। कभी तीन बीघा जमीन और एक भैंस वाले परिवार के पास आज सिर छिपाने के लिए छोटा और कच्चा-पक्का कमरा ही हैं। परिवार में कुल 12 सदस्य हैं। सभी सदस्य दो भाइयों के बीच बंटे एक-एक कमरे के मकानों में रहते हैं।

    बड़े भाई के चार और छोटे भाई के तीन बच्चे हैं। बरसात के दिनों में इन कमरों की कमजोर छत टपकने लगती है और पूरा परिवार रात भर बर्तनों में पानी भरते हुए गुजारता है। परिवार की बुजुर्ग मां पास ही एक कमरे और बरामदे वाले छोटे से मकान में अकेली रहती हैं।

    family of aligarh

    पीड़ित परिवार की हालत।

    पिता ने शुरू की थी न्याय की लड़ाई

    न्याय की इस लड़ाई की शुरुआत पिता ने की थी। बेटी को इंसाफ दिलाने के लिए उन्होंने वर्षों तक थानों, वकीलों और अदालतों के चक्कर लगाए। मुकदमे का खर्च उठाने के लिए परिवार को अपनी तीन बीघा जमीन और भैंस तक बेचनी पड़ी। लगातार संघर्ष और आर्थिक तंगी के बीच वर्ष 2020 में उनकी मौत हो गई।

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    बड़े बेटे ने उठाई जिम्मेदारी

    पिता के निधन के बाद बड़े बेटे ने मुकदमे की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली। घर का खर्च चलाने और केस की पैरवी के लिए वह दिल्ली में मजदूरी करने गया। दिनभर मजदूरी कर जो कमाई होती, उसी में से एक-एक रुपया बचाकर मुकदमे की पैरवी पर खर्च करता रहा।

    परिवार का कहना है कि कई बार हालात इतने कठिन हो गए कि लगा अब न्याय की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए, लेकिन पिता का सपना उन्हें आगे बढ़ाता रहा। बड़े बेटे ने बताया कि जिन लोगों के खिलाफ वे लड़ रहे थे, वे इलाके के प्रभावशाली और दबंग लोग थे। उनके सामने यह परिवार बेहद कमजोर और असहाय था। इसके बावजूद उन्होंने समझौता नहीं किया और कानूनी लड़ाई जारी रखी।

    पांच दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई तो राहत मिली

    शनिवार को जब परिवार को पता चला कि अदालत ने पांच दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है तो वर्षों बाद घर में राहत की एक किरण दिखाई दी। परिवार का कहना है कि बेटी वापस नहीं लौटी और शायद उसकी कमी कभी पूरी नहीं होगी, लेकिन दोषियों को सजा मिलने से यह विश्वास जरूर मिला है कि न्याय देर से सही, मिला जरूर।

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    2007 में शुरू हुआ था ये मामला

    मामले की शुरुआत वर्ष 2007 में हुई थी। परिवार की बेटी के साथ कथित दुष्कर्म के बाद मुकदमा दर्ज हुआ। आरोप है कि जमानत पर छूटने के बाद आरोपितों ने समझौते का दबाव बनाया और विरोध करने पर युवती का दोबारा अपहरण कर लिया ताकि वह अदालत में गवाही न दे सके। इसके बाद वह कभी घर नहीं लौट सकी। दूसरी बार अपहरण के बाद तत्काल मुकदमा दर्ज नहीं होने पर परिवार ने अदालत की शरण ली। न्यायालय के आदेश पर भारतीय दंड संहिता की धारा 363, 364 तथा एससी/एसटी एक्ट के तहत छह लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया।

    2026 में आरोपितए हुए थे बरी लेकिन विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट)  ने सुनाई सजा

    मुख्य गवाह के लापता होने के कारण 22 मई 2026 को दुष्कर्म के मामले में सभी आरोपित बरी हो गए। हालांकि, अपहरण के मुकदमे में विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) ने 30 जुलाई 2026 को पांच आरोपितों को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई, जबकि एक आरोपित को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया। पीड़ित परिवार को फैसले की जानकारी दूसरे दिन न्यायालय पहुंचने की बात पता चली।

    परिवार का कहना है कि अखबार में प्रकाशित समाचार वे नहीं पढ़ सके। करीब 19 वर्ष बाद आए इस फैसले ने परिवार को न्याय का एहसास तो कराया है, लेकिन घर के बाहर हर आहट पर आज भी एक उम्मीद जागती है कि शायद एक दिन उनकी बेटी लौट आए।

    एक आरोपित के बरी होने पर करेगा कानूनी सलाह

    एडीजे (एससी-एसटी एक्ट) प्रतिभा सक्सेना की अदालत ने इस मामले में आरोपित ऊषा, अमर सिंह, लेखराज, सुरेश और बाबूलाल को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास और 20-20 हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई है।

    साक्ष्यों के अभाव में सतीश संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया। मामले में करीब दो दशक बाद आए इस फैसले को पीड़ित परिवार ने न्याय की बड़ी जीत बताया है।

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