गैस सिलिंडर महंगा हो या सस्ता… नहीं पड़ता कोई फर्क, इस घर में 40 साल से बायोगैस पर जल रहा चूल्हा
अंबेडकरनगर के बलुआ बहादुरपुर गांव में अखिलेंद्र प्रताप सिंह का परिवार 40 साल से बायोगैस संयंत्र का उपयोग कर रहा है। यह परिवार बढ़ती एलपीजी कीमतों से अ ...और पढ़ें


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
जागरण संवाददाता, अंबेडकरनगर। बढ़ती एलपीजी कीमतों और अंतरराष्ट्रीय तनाव के दौर में जहां आम परिवार रसोई गैस की किल्लत से परेशान हैं, वहीं जलालपुर ब्लाक के बलुआ बहादुरपुर गांव में एक परिवार पिछले चार दशकों से आत्मनिर्भरता की मिसाल बना हुआ है। ईरान-इजरायल और अमेरिका युद्ध का इस पर कोई असर नहीं है।
गांव निवासी अखिलेंद्र प्रताप सिंह के यहां वर्ष 1983 में स्थापित बायोगैस संयंत्र आज भी सुचारु रूप से चल रहा है। इस संयंत्र से निकलने वाली गैस पर उनके परिवार के आठ सदस्यों का भोजन बिना किसी खर्च के रोजाना तैयार होता है।
अखिलेंद्र प्रताप सिंह बताते हैं कि उन्होंने उस समय बायोगैस संयंत्र लगवाया था, जब गांव में इसके बारे में जागरूकता बहुत कम थी। शुरुआती मेहनत और समझदारी के साथ उन्होंने इसे नियमित रूप से चलाया और आज यह उनके परिवार की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है।
एलपीजी के बढ़ते दाम से बेफिक्र
आज जब एलपीजी सिलिंडर के दाम लगातार बढ़ रहे हैं और वैश्विक परिस्थितियों का असर आम लोगों की जेब पर पड़ रहा है। तब यह परिवार पूरी तरह निश्चिंत है। उन्हें न गैस बुक कराने की चिंता है, और न ही कीमत बढ़ने का डर है।
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खेतों के लिए भी वरदान
बायोगैस संयंत्र से निकलने वाला अपशिष्ट खेतों में खाद के रूप में उपयोग किया जा रहा है। इससे न केवल रासायनिक खाद पर खर्च कम हुआ है, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता में भी सुधार हुआ है। फसल की पैदावार में बढ़ोतरी से परिवार को अतिरिक्त लाभ मिल रहा है। 'आम के आम गुठलियों के भी दाम' वाली कहावत यहां चरितार्थ हो रही है।
पर्यावरण संरक्षण में भी योगदान
यह संयंत्र पर्यावरण के लिए भी लाभकारी साबित हो रहा है। गोबर और जैविक कचरे का सही उपयोग होने से स्वच्छता बनी रहती है और प्रदूषण भी कम होता है। गांव के अन्य लोग भी अब इस मॉडल को देखकर प्रेरित हो रहे हैं।
कई ग्रामीण बायोगैस संयंत्र लगाने की योजना बना रहे हैं, ताकि वे भी ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकें। बलुआ बहादुरपुर का यह परिवार साबित कर रहा है कि सही सोच और पहल से ग्रामीण क्षेत्र में भी आत्मनिर्भरता हासिल की जा सकती है।