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    हरीश राणा एम्स में किए गए भर्ती, परिवार ने लिया अंगदान का संकल्प; 13 साल जिस बेड पर रहे वह हुआ सूना

    Updated: Sat, 14 Mar 2026 06:25 PM (IST)

    हरीश राणा को 13 साल बाद सुप्रीम कोर्ट की अनुमति से परोक्ष इच्छामृत्यु के लिए एम्स में भर्ती कराया गया। चंडीगढ़ में दुर्घटना के बाद वे स्थायी वेजिटेटिव ...और पढ़ें

    सुप्रीम कोर्ट द्वारा परोक्ष इच्छामृत्यु की अनुमति मिलने के तीन दिन बाद चिकित्सीय प्रक्रिया के बीच हरीश राणा को परिवार के लोगों ने नम आंखों से एम्स के लिए विदा किया।

    सुप्रीम कोर्ट द्वारा परोक्ष इच्छामृत्यु की अनुमति मिलने के तीन दिन बाद चिकित्सीय प्रक्रिया के बीच हरीश राणा को परिवार के लोगों ने नम आंखों से एम्स के लिए विदा किया।

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    संक्षेप में पढ़ें

    शाहनवाज अली, गाजियाबाद। यह सिर्फ एक मरीज की विदाई नहीं थी, यह एक परिवार के धैर्य, प्रेम और करुणा की अंतिम परीक्षा थी। हरीश राणा का मामला अब केवल निजी पीड़ा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारत की न्यायिक और नैतिक चेतना का प्रतीक बन गया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा परोक्ष इच्छामृत्यु की अनुमति मिलने के तीन दिन बाद चिकित्सीय प्रक्रिया के बीच हरीश राणा को परिवार के लोगों ने नम आंखों से एम्स के लिए विदा किया।

    भीतर से टूटा परिवार का मनोबल

    वर्ष 2013 में चंडीगढ़ में चौथी मंजिल से गिरने के बाद हरीश 13 वर्षों से स्थायी वेजिटेटिव स्टेट में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे थे। बेड पर बीते करीब 13 वर्षों ने परिवार को भीतर तक तोड़ दिया, लेकिन उन्होंने उम्मीद और मानवता का दामन नहीं छोड़ा। पिता अशोक राणा, मां निर्मला देवी और भाई आशीष राणा ने अपने सामर्थ्य के अनुसार उनके स्वास्थ्य की प्रार्थना के साथ ही चिकित्सा के हर क्षेत्र में उनका इलाज कराया, लेकिन सफलता नहीं मिल सकी।

    कानून बना मानवीय

    इस बीच उन्होंने हरीश को अपने बीच रखने के तमाम जतन के बीच देखभाल में कोई कमी नहीं की। उनके लिए हरीश की विदाई ऐसा सन्नाटा छोड़ गई, जिसे शब्दों में कह पाना बेहद कठिन है। घर की वह जगह जहां हरीश का बेड था। अब वह जगह पूरी तरह खाली नजर आएगी। यह खबर सिर्फ एक फैसले की नहीं, बल्कि उस करुणा की है, जिसने कानून को मानवीय बनाया और पीड़ा को अर्थ दिया।

    दुख से उपजा संकल्प, मानवता की मिसाल

    हरीश के माता-पिता ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि यदि इच्छामृत्यु की अनुमति मिलती है, तो हरीश के कार्यशील अंग दान किए जाएंगे। अपने बेटे की विदाई को दूसरों के जीवन की शुरुआत में बदल देने का यह संकल्प मानवता की मिसाल है। अशोक राणा का दर्द शब्दों से परे है, लेकिन उनका फैसला यह संदेश देता है कि सबसे गहरे दुख में भी इंसानियत की लौ बुझती नहीं।

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    जब जीवन पीड़ा बन जाए, करुणा ही न्याय

    हरीश राणा केस की सुप्रीम कोर्ट में निशुल्क सेवा देने वाले अधिवक्ता मनीष जैन का कहना है कि हरीश राणा का केस भारतीय संविधान के उस मूल भाव को सामने लाता है, जिसमें जीवन के अधिकार के साथ-साथ गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार को भी स्थान दिया गया। यह फैसला समाज को यह संदेश देता है कि कानून संवेदनहीन नहीं है। जहां जीवन केवल पीड़ा बन जाए, वहां करुणा ही न्याय का सर्वोच्च रूप होती है। उन्होंने कहा जीवन का अधिकार केवल सांसों तक सीमित नहीं, बल्कि गरिमा से जीने और गरिमा से विदा होने का भी अधिकार है। जहां जीवन असहनीय पीड़ा में बदल जाए, वहां करुणा ही न्याय का सर्वोच्च रूप बन जाती है।

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