गाजियाबाद दुष्कर्म पीड़िता केस: इलाज से इनकार पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, दो अस्पताल देंगे 12 लाख रुपये मुआवजा
सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के दो अस्पतालों को दुष्कर्म पीड़िता के पिता को 12 लाख रुपये देने का आदेश दिया, जिसकी इलाज न मिलने से मौत हो गई थी। अदालत ने ...और पढ़ें

सुप्रीम कोर्ट का निर्देश। फाइल फोटो
HighLights
सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के दो अस्पतालों को मुआवजा देने का निर्देश दिया।
इलाज न मिलने से दुष्कर्म पीड़िता बच्ची की मौत हो गई थी।
अदालत गंभीर अपराध पीड़ितों के लिए नए दिशानिर्देश बनाएगी।
पीटीआई, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को गाजियाबाद के दो निजी अस्पतालों को चार वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता के पिता को कुल 12 लाख रुपये देने का निर्देश दिया।
इलाज करने से इन्कार कर दिए जाने के बाद इस बच्ची की मौत हो गई थी। शीर्ष अदालत ने कहा कि इस मामले ने कानूनी सुरक्षा उपायों और धरातल पर उनके कार्यान्वयन के बीच परेशान करने वाले अंतर को उजागर किया है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि वह गंभीर अपराध के पीड़ितों को संभालने के लिए अस्पतालों और कानून लागू करने वाली एजेंसियों के लिए व्यापक दिशानिर्देश (गाइडलाइंस) बनाएगी ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि ऐसी चूक दोबारा न हो।
पांच घंटे बाद भी जिंदा थी बच्ची
पीठ ने विशेष जांच दल (एसआइटी) के इस निष्कर्ष पर संज्ञान लिया कि बच्ची गंभीर चोटों के बाद भी करीब पांच घंटे तक जिंदा रही, लेकिन उसे समय पर इलाज नहीं मिला। पीठ ने सेंट जोसेफ (मरियम) हास्पिटल को 10 लाख रुपये और खजान सिंह मन्नवी हेल्थ केयर को दो लाख रुपये चार हफ्ते के अंदर दिवंगत बच्ची के पिता को देने का निर्देश दिया।
पीठ बच्ची के दिहाड़ी मजदूर पिता की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें घटना की कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग की गई थी। कोर्ट ने इससे पहले एसआइटी का गठन किया था। यह मामला 16 मार्च को बच्ची के साथ कथित दुष्कर्म एवं हत्या से जुड़ा है।
खबरें और भी
बच्ची का एक पड़ोसी उसे बहला-फुसलाकर ले गया था। बाद में परिवार ने बच्ची को बेहोश पाया था और उसके शरीर से बहुत खून बह रहा था। दोनों निजी अस्पतालों ने उसका इलाज करने से इन्कार कर दिया था। इसके बाद उसे एक सरकारी अस्पताल में शिफ्ट किया गया था, जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया।
पुलिसकर्मियों को और अधिक संवेदनशील बनाने की जरूरत
सुनवाई को दौरान पीठ ने कहा कि गंभीर अपराधों के पीड़ितों से जुड़े मामलों से कभी-कभी असंवेदनशील एवं अमानवीय तरीके से निपटा जाता है, जिससे उत्पीड़न और बढ़ जाता है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि समय-समय पर ट्रेनिंग और ओरिएंटेशन प्रोग्राम के जरिये पुलिसकर्मियों को और अधिक संवेदनशील बनाने की जरूरत है, ताकि हमदर्दी और तत्काल कार्रवाई आपराधिक जांच का अभिन्न हिस्सा बन जाए।
एसआइटी रिपोर्ट का जिक्र करते हुए जस्टिस बागची ने कहा कि अस्पतालों में इमरजेंसी डाक्टरों को बुलाया जा सकता था, लेकिन ऐसी कोई कोशिश नहीं की गई।
यह भी पढ़ें- दुष्कर्म की शिकायत पर FIR नहीं होने पर हाई कोर्ट सख्त, भोपाल पुलिस कमिश्नर को तीन दिन में कार्रवाई के निर्देश