एक मां ऐसी भी....जरूरतमंद बेटियों की करतीं मदद, दान कर दिया दो करोड़ का घर
कानपुर की पूर्णिमा साहू ने बेटियों के विवाह और चिकित्सा सुविधा के लिए अपना दो करोड़ रुपये का घर दान कर दिया। मातृ दिवस पर उनके इस त्याग को याद किया जा ...और पढ़ें

पूर्णिमा साहू। स्वयं
HighLights
पूर्णिमा साहू ने दो करोड़ का घर दान किया
बेटियों के विवाह, चिकित्सा सुविधा हेतु समर्पित
मातृ दिवस पर उनके त्याग को सराहा गया
शिवा अवस्थी, कानपुर। बेटियों के सामूहिक विवाह के लिए वर्ष 2019 में किदवई नगर में एक लाख रुपये की सहयोग धनराशि देने पहुंचीं तो वहां सीढ़ियों में चढ़ने में दिक्कत पर दर्द महसूस हुआ। इसके बाद हर वर्ग की बेटियों के विवाह, चिकित्सा सुविधा के लिए कुछ अलग करने की सोच मन में आई।
सात साल बाद उस सोच को उन्होंने मूर्तरूप दिया व इसी साल फरवरी में जीटी रोड किनारे कृष्णापुरम योजना संख्या दो में एम ब्लाक स्थित अपना दो करोड़ रुपये का घर दान कर दिया। मातृ दिवस रविवार को है। ऐसे में, रक्षा मंत्रालय की आयुध पैराशूट निर्माणी कानपुर में राजपत्रित अधिकारी रहीं व 31 जुलाई,2019 को सेवानिवृत्त हुईं बेटियों की मां पूर्णिमा साहू के योगदान को याद किया जा रहा है।
पूर्णिमा बताती हैं कि उन्होंने समाजसेवा के लिए शादी नहीं की।उनके पिता गौरीशंकर साहू व मां शोभा साहू हमेशा सामाजिक तानाबाना जोड़ने को प्रयासरत रहे। उनकी ही प्रेरणा से ये सोच आई कि कोई जरूरतमंद हो, भले वह किसी भी वर्ग का हो, उसके लिए उनके घर के दरवाजे हमेशा खुले रहेंगे। समाज की पीड़ा को महसूस कर माता-पिता की स्मृति में तैलिक पिछड़ा वैश्य महासभा ट्रस्ट को ये घर दिया।
उन्होंने इस भवन को दुर्गा कुटी नाम भी इसीलिए दिया कि हर बेटी में मां दुर्गा की छवि है। हर वर्ग की गरीब बेटियों को इसका लाभ मिल सके। बताया कि कानपुर में तेली समाज की जनसंख्या लगभग दो लाख के आसपास है। उनसे प्रेरणा लेकर लोग भविष्य में विद्यालय, छात्रावास, अस्पताल या बड़े कार्यालय स्थापित करने को कदम बढ़ाएंगे।
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यह एक भवन का दान नहीं, बल्कि समाज की एकता, संगठन, सम्मान व भविष्य को समर्पित ऐतिहासिक संकल्प है। तीन मई को इसी भवन में सामूहिक विवाह के लिए वर-वधू परिचय कार्यक्रम में आए एसके साहू, अजय कुमार साहू, रमेश राठौर, हरीलाल साहू, अर्चना गुप्ता, प्रीति साहू, डा. एके साहू समेत अन्य ने इसे प्रेरक कदम बताया। पूर्णिमा कहती हैं कि घर केवल ईंट-पत्थरों से नहीं बनते, ये त्याग, प्रेम, संवेदना व समाज के प्रति समर्पण से खड़े होते हैं।