Yogi Cabinet Expansion: सपा के गढ़ में सेंध की तैयारी, भाजपा ने मंत्रिमंडल विस्तार से बिछाई बिसात
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मंत्रिमंडल विस्तार को भाजपा की 2027 विधानसभा चुनाव की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। इसका उद्देश्य गैर-यादव पिछड़ों और ...और पढ़ें

पूर्व सीएम अखिलेश और सीएम योगी। इंटरनेट मीडिया
HighLights
2027 विधानसभा चुनाव हेतु योगी मंत्रिमंडल का विस्तार हुआ
भाजपा का गैर-यादव पिछड़ों, दलितों पर विशेष फोकस किया
कानपुर-बुंदेलखंड में सामाजिक संतुलन मजबूत करने की रणनीति
रितेश द्विवेदी, कानपुर। विधानसभा चुनाव 2027 से पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मंत्रिमंडल विस्तार को भाजपा की बड़ी राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी ने इस विस्तार के जरिए गैर-यादव पिछड़ों, दलितों और क्षेत्रीय जातीय समीकरणों को साधने का प्रयास किया है। खासतौर पर कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र पर फोकस करते हुए ऐसे चेहरों को आगे लाया गया है, जिनका असर ओबीसी और अनुसूचित जाति मतदाताओं पर माना जाता है।
2024 लोकसभा चुनाव में इस क्षेत्र में कमजोर पड़े प्रदर्शन के बाद भाजपा अब सामाजिक संतुलन और संगठनात्मक पकड़ मजबूत कर 2027 की चुनावी जमीन तैयार करने में जुट गई है। भाजपा ने इस विस्तार के जरिए साफ संकेत दिया है कि आने वाले चुनावों में सामाजिक और जातीय संतुलन उसकी सबसे बड़ी रणनीति रहने वाली है। छह नए चेहरों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है, जबकि दो मौजूदा मंत्रियों का कद बढ़ाकर उन्हें स्वतंत्र प्रभार दिया गया है।
इन्हें बनाया कैबिनेट मंत्री
मंत्रिमंडल विस्तार में भूपेंद्र सिंह चौधरी और मनोज पांडेय को कैबिनेट मंत्री बनाया गया है। वहीं कानपुर देहात की सिकंदरा सीट से विधायक अजीत सिंह पाल और मेरठ दक्षिण से विधायक सोमेंद्र तोमर को राज्यमंत्री से प्रोन्नत कर स्वतंत्र प्रभार दिया गया है। इसके अलावा कृष्णा पासवान, कैलाश राजपूत, सुरेंद्र सिंह दिलेर और हंसराज विश्वकर्मा को राज्यमंत्री बनाया गया है। भाजपा ने इस विस्तार के जरिए गैर-यादव पिछड़े और दलित वोट बैंक को साधने की रणनीति पर खास जोर दिया है।
इस वजह से विस्तार
माना जा रहा है कि पार्टी ने समाजवादी पार्टी के पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण को कमजोर करने के लिए यह सामाजिक संतुलन तैयार किया है। खासतौर पर कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए कई ऐसे चेहरों को आगे लाया गया है, जिनका प्रभाव पिछड़ी और दलित जातियों में माना जाता है। मंत्री बनाए गए कैलाश राजपूत और अजीत सिंह पाल के जरिए भाजपा ने लोधी राजपूत और अन्य पिछड़ा वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत करने की तैयारी की है।
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इन क्षेत्रों में राजनीतिक असर
इसका असर कानपुर देहात, कन्नौज, फर्रुखाबाद, मैनपुरी, औरैया और इटावा तक देखने को मिल सकता है। कन्नौज से पहले ही असीम अरुण सरकार में प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। ऐसे में इसे सीधे तौर पर अखिलेश यादव की सामाजिक और राजनीतिक जमीन को चुनौती देने की रणनीति माना जा रहा है। फतेहपुर से कृष्णा पासवान को मंत्री बनाकर भाजपा ने दलित वर्ग में भी मजबूत संदेश देने की कोशिश की है। यह इलाका इसलिए भी अहम है क्योंकि यहां से समाजवादी पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम पटेल सांसद हैं। कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र में 2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा था। 10 में से छह सीटें समाजवादी पार्टी के खाते में चली गई थीं और विधानसभा की 52 सीटों में लगभग 33 पर सपा गठबंधन बढ़त में रहा था।
क्षेत्रीय संतुलन की कोशिश
भाजपा पहले से ही क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने की कोशिश करती रही है। कानपुर में सतीश महाना, कानपुर देहात में राकेश सचान और प्रतिभा शुक्ला, बांदा में रामकेश निषाद, कन्नौज में असीम अरुण और जालौन क्षेत्र में स्वतंत्रदेव सिंह पहले से प्रभाव रखते हैं। वहीं साध्वी निरंजन ज्योति को राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की जिम्मेदारी देकर भाजपा ने निषाद और पिछड़े वर्गों में भी अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास किया है।
ये है पूरी रणनीति
कानपुर-बुंदेलखंड भाजपा के लिए हमेशा से सबसे मजबूत राजनीतिक क्षेत्र रहा है। 2017 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने यहां 52 में से 47 सीटें जीती थीं, जबकि 2022 में भी 41 सीटों पर कब्जा बरकरार रखा। 2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा ने सभी 10 सीटों पर जीत दर्ज की थी, लेकिन 2024 में तस्वीर पूरी तरह बदल गई। भाजपा चार सीटों पर सिमट गई और कानपुर व फर्रुखाबाद जैसी सीटों पर जीत का अंतर भी बेहद कम रहा। ऐसे में माना जा रहा है कि मंत्रिमंडल विस्तार के जरिए भाजपा ने 2027 विधानसभा चुनाव से पहले खोई हुई राजनीतिक बढ़त वापस पाने की जमीन तैयार करनी शुरू कर दी है।