वेस्ट UP में दलित बनाम भाजपा का नैरेटिव गढ़ने में जुटा विपक्ष; कपसाड़ मामले के बाद ललिता गौतम हत्याकांड बना मुद्दा
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विपक्ष दलितों के खिलाफ अत्याचार को मुद्दा बनाकर भाजपा विरोधी नैरेटिव गढ़ने में जुटा है। ललिता गौतम हत्याकांड और अन्य प्रकरणों ...और पढ़ें

सोमवार को मेरठ में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम। इंसेट में नगीना सांसद चंद्रशेखर।
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ललिता हत्याकांड में प्रशासनिक चूक को दलित विरोधी भाजपा बनाने का प्रयास।
इससे पहले सरधना के कपसाड़ कांड पर भी खूब गरमाई थी राजनीति।
प्रदीप द्विवेदी, मेरठ। दलितों के खिलाफ अत्याचार को मुद्दा बनाकर पश्चिमी उप्र में विपक्ष की कोशिश भाजपा विरोधी नैरेटिव गढ़ने की है। ललिता हत्याकांड प्रकरण एक बार फिर विपक्ष के लिए राजनीतिक अवसर बना। सामाजिक और शैक्षिक उन्नति से चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाने वाले यहां के दलित समाज को सभी दलों ने हमेशा लुभाने और दूसरों दलों से दूर करने की रणनीति अपनाई।
छात्रा ललिता गौतम हत्याकांड के एक आरोपित को बचाने के प्रयास का आरोप लगाते हुए आठ जुलाई को कलक्ट्रेट में धरना प्रदर्शन कर रही भीड़ पर पुलिस लाठीचार्ज और प्रदर्शनकारियों पर एसएसपी अविनाश पांडेय के थप्पड़ जड़ने का वीडियो खूब प्रसारित किया गया।
विपक्ष ने उस प्रशासनिक चूक को दलित विरोधी भाजपा व दलित विरोधी सरकार के रूप में प्रस्तुत किया। कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल के पद संभालते ही बड़ा मुद्दा हाथ लगा। उन्होंने पुलिस के खिलाफ आक्रामक बयान दिया। यही नहीं सांसद व विधायकों का प्रतिनिधिमंडल भी मेरठ भेजा गया।
आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष व नगीना के सांसद चंद्रशेखर बसपा को किनारे कर दलितों का नेतृत्वकर्ता बनने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उन्होंने इस प्रकरण को बड़ा रूप देने का प्रयास किया। वहीं सपा भी दलित वोट बैंक को साइकिल पर लाने को बेताब है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव हों, बसपा की अध्यक्ष मायावती या फिर कांग्रेस नेता, सभी ने इसे अपने-अपने हिसाब से भुनाने का प्रयास तेज कर दिया।
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कैराना की सांसद इकरा हसन ने पीड़ित परिवार को दिल्ली ले जाकर अखिलेश यादव से उनकी मुलाकात कराई। अखिलेश ने उन्हें आर्थिक सहायता देने के साथ हर मदद का आश्वासन दिया। सरधना से सपा विधायक अतुल प्रधान ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग को पत्र लिखकर पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की है।
यह कोई पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले इसी साल आठ जनवरी को सरधना विधानसभा क्षेत्र के कपसाड़ गांव का प्रकरण भी चर्चा का विषय बना था। क्षत्रिय समाज के आरोपित सागर सोम ने दलित समाज की अपनी प्रेमिका का अपहरण कर उसकी मां की हत्या कर दी थी।
उस प्रकरण में भी विपक्ष ने यही रणनीति अपनाई थी। इसके बाद काफी दिन तक माहौल तनावपूर्ण रहा, सपा और आजाद समाज पार्टी ने मुद्दा बनाकर सरकार को घेरा था।
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कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय भी परिवार से मिलने के लिए मेरठ आए थे, हालांकि पुलिस-प्रशासन ने उन्हें गांव तक नहीं जाने दिया था। मामले को जातिगत रूप देकर भाजपा बनाम दलित की तरफ मोड़ने का प्रयास किया। दो अप्रैल 2018 को कौन भूल सकता है, जब दलित आंदोलन ने हिंसा का रूप ले लिया था।
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हिंसा भड़काने के आरोप में सपा नेता व बसपा से पूर्व विधायक योगेश वर्मा पर रासुका तक लगाया गया था। 2024 लोकसभा चुनाव के दौरान भी दलित बनाम भाजपा बनाने के लिए विपक्ष ने नैरेटिव गढ़ा कि 400 पार होगा तो बाबा साहेब का संविधान बदल जाएगा।