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    प्राधिकरणों की लापरवाही से नोएडा-ग्रेटर नोएडा के श्रमिक आज भी बेघर, कमाई जा रही कमरे का किराया चुकाने में

    Updated: Wed, 22 Apr 2026 07:48 AM (GMT+05:30)

    नोएडा और ग्रेटर नोएडा में औद्योगिक विकास के बावजूद, प्राधिकरणों ने श्रमिकों के लिए पर्याप्त आवासीय सुविधाएँ प्रदान नहीं कीं। परिणामस्वरूप, श्रमिक महंग ...और पढ़ें

    नोएडा एवं ग्रेटर नोएडा में श्रमिकों की कमाई का बड़ा हिस्सा कमरे का किराया चुकाने में ही खर्च हो जाता है। एआई इमेज

    नोएडा एवं ग्रेटर नोएडा में श्रमिकों की कमाई का बड़ा हिस्सा कमरे का किराया चुकाने में ही खर्च हो जाता है। एआई इमेज

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    धर्मेंद्र चंदेल, नोएडा। नोएडा, ग्रेटर नोएडा की परिकल्पना औद्योगिक शहर के रूप में जरूर की गई, लेकिन इनमें काम करने वाले श्रमिक और कर्मचारियों को आवासीय सुविधा देने की प्राधिकरण ने कोई ठोस योजना नहीं बनाई। जिले में कार्यरत नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण स्वयंसेवी संस्था है। श्रमिकों के आवास की व्यवस्था प्राधिकरणों को ही करनी थी। इसमें सरकार की भूमिका नहीं थी।

    अब तक मात्र दो योजनाएं आईं

    नोएडा में 1980 में सिर्फ दो सेक्टरों में श्रमिक कुंज के नाम से आवासीय योजना निकाली गई। इनमें दो हजार श्रमिकों को 30 और 40 वर्ग मीटर में मकान बनाकर आवंटित किए। ग्रेटर नोएडा में मात्र एक सेक्टर में श्रमिक विहार योजना निकालकर 275 श्रमिकों को आवास मुहैया कराए गए। 2007 में मायावती सरकार कांशीराम आवासीय योजना लाई। दोनों शहरों में 30 वर्ग मीटर में करीब 12 मकान बनाकर यहां काम करने वाले लोगों को आवंटित किए। इसके बाद कोई योजना नहीं आई।

    फिर श्रमिकों के आवास के लिए योजना नहीं निकाली

    इस दौरान औद्योगिक नगरी के तौर पर विकास का पहिया तो आगे बढ़ता गया, पर श्रमिकों के हित में उनको आवास देने की अनदेखी होती चली गई। प्राधिकरण जनता फ्लैट के नाम पर छोटे मकानों की योजना तो निकालता रहा, लेकिन इसमें श्रमिकों को प्राथमिकता नहीं दी गई। बड़ी संख्या में देशभर से आवेदक आने से यहां काम करने वाले श्रमिक आवास से वंचित रह गए।प्राधिकरण बिल्डर, शैक्षिक संस्थान, अस्पताल, नर्सिंग होम, माल आदि को महंगी दरों पर जमीन बेचकर अपना अकाउंट भरता रहा, लेकिन श्रमिकों के आवास के लिए योजना नहीं निकाली।

    श्रमिकों के मकानों पर कर लिया कब्जा

    नोएडा की स्थापना के कुछ समय बाद सेक्टर 66 व 93 में श्रमिक कुंज याेजना निकाली गई। ग्रेटर नोएडा के गामा दो सेक्टर में श्रमिक विहार योजना निकली। इनमें मूल श्रमिक मकान पाने में कामयाब रहे। 2007 में कांशीराम आवासीय योजना के तहत विभिन्न सेक्टरों में 30 वर्ग मीटर के 12 हजार मकान श्रमिकों को दिए जाने थे, लेकिन निर्माण के बाद श्रमिकों के बजाए ज्यादातर मकानों को प्राधिकरण में निर्माण कार्य करने वाले ठेकेदारों के लोग, अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के यहां काम करने वालों को आवंटित कर दिए गए। मूल श्रमिक मकान पाने से वंचित रह गए। अखिलेश यादव सरकार नोएडा में झुग्गी झोपड़ी पुनर्वास योजना लाई, लेकिन इसके तहत सिर्फ 400 मकान ही बन सकें। इसके बाद से श्रमिक हित में कोई पहल नहीं हुई।

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    गांवों में अधिक किराये पर मकान लेने को मजबूर

    सेक्टर और सोसायटियों की संख्या बढ़ने के साथ ही गांव का भी विकास हुआ। शहर में श्रमिकों की संख्या बढ़ी तो आवास के लिए उन्होंने गांवों की तरफ रूख किया। ग्रामीणों ने अपने घरों में किराये के मकान बना दिए। यहीं किराया तेजी से बढ़ने लगा। गांवों के आवास भी श्रमिकों के किराए के दायरे से बाहर हो गए।

    वेतन चला जाता है किराये में

    एक-एक कमरे में चार-चार श्रमिक एक साथ रहते हैं। कुछ श्रमिकों ने शिफ्ट में कमरा ले रखा है। इसका असर श्रमिकों की आय पर पड़ा। वेतन का अधिकांश हिस्सा किराये पर खर्च होने लगा। कम बचत होने से श्रमिकों की मानसिक और शारीरिक क्षमता भी प्रभावित हुई। इसका असर उद्योगों में काम करते समय उत्पादन पर भी पड़ा। श्रमिक न तो आर्थिक रूप से उभर सके और न ही शारीरिक रूप से मजबूत हो सके।

    दस प्रतिशत आरक्षण का बना था प्रविधान

    वर्ष 2001 में प्राधिकरण ने प्रविधान किया था कि जिन सेक्टरों में आवासीय योजना लाई जाएगी, उनमें कुल क्षेत्रफल का दस प्रतिशत हिस्सा श्रमिकों के आवास के लिए आरक्षित रहेगा। यह योजना भी परवान नहीं चढ़ सकी।

    उद्योगों के समीप ही आवास की व्यवस्था

    श्रमिकों को उद्योगों के नजदीक ही घर देना बेहद जरूरी है। इससे आने-जाने में समय कम लगेगा। श्रमिक पैदल चलकर समय से उद्योगों में पहुंचेंगे तो उत्पादन अधिक होगा। रुपये की बचत होने से श्रमिक अपने बच्चों की पढ़ाई और पालन-पोषण पर अधिक खर्च कर सकेंगे। इससे उनकी मानसिक स्थिति मजबूत होगी। प्राधिकरण की स्थापना के समय उद्योगों के नजदीक ही घर देने की परिकल्पना की गई थी।

    -बृजेश कुमार, पूर्व सीईओ व चेयरमैन, नोएडा, ग्रेटर नोएडा व यमुना प्राधिकरण

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