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    बाल विवाह को लेकर इलाहाबाद HC सख्त: मामले बढ़ने पर पुलिस को ठहराया जिम्मेदार, DGP को निर्देश जारी करने का आदेश

    Updated: Sat, 23 May 2026 11:37 PM (IST)

    इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रदेश में बढ़ते बाल विवाह पर गंभीर चिंता जताते हुए पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने डीजीपी को बाल विवाह रोकने क ...और पढ़ें

    बाल विवाह पर इलाहाबाद हाई कोर्ट सख्त।

    बाल विवाह पर इलाहाबाद हाई कोर्ट सख्त।

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    विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रदेश में बढ़ रहे बाल विवाह के मामलों पर गंभीर चिंता जताते हुए पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने कहा कि बाल विवाह रोकने के लिए बने कानूनों का सही तरीके से पालन नहीं होने के कारण यह सामाजिक बुराई लगातार बढ़ रही है। आज तक उसके सामने एक भी ऐसा मामला नहीं आया, जिसमें पुलिस ने ऐसे मामलों में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की हो।

    अदालत ने पुलिस को इसके लिए जिम्मेदार मानते हुए पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को मातहत अधिकारियों के लिए जरूरी निर्देश और दिशा-निर्देश जारी करने का आदेश दिया है।न्यायमूर्ति राजीव गुप्ता और न्यायमूर्ति अजय कुमार (द्वितीय) की खंडपीठ ने यह टिप्पणी आजाद अंसारी और उनके परिवार की ओर से दाखिल आपराधिक याचिका की सुनवाई के दौरान की।

    याचिका में देवरिया के महुआडीह थाने में दर्ज एफआईआर रद करने की मांग की गई थी। मामला 14 वर्षीय लड़की के कथित अपहरण और बाल विवाह से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि नाबालिग लड़की ने अपनी इच्छा से मार्च में मुस्लिम रीति-रिवाज के अनुसार आजाद अंसारी से विवाह किया था और वह उसके साथ रह रही है।

    वहीं सरकारी पक्ष ने तर्क दिया कि लड़की नाबालिग थी और उसे बहला-फुसलाकर माता-पिता की देखरेख से दूर ले जाया गया।कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि मामले में आरोप गंभीर हैं और पर्याप्त साक्ष्य भी जुटाए जा चुके हैं। इसलिए इस स्तर पर एफआईआर रद नहीं की जा सकती।

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    अदालत ने कहा कि बाल विवाह का उन्मूलन केवल कानूनी लक्ष्य नहीं बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी भी है। खंडपीठ ने कहा कि पुलिस अक्सर बाल विवाह निषेध अधिनियम-2006 की धारा 10 और 11 के तहत जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई नहीं करती।

    अदालत ने यह भी कहा कि बाल विवाह कराने वाले कुछ सामाजिक और धार्मिक संगठन आधार कार्ड या हलफनामे के आधार पर विवाह करा देते हैं, जबकि आधार कार्ड में दर्ज जन्मतिथि उम्र का वैध प्रमाण नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने निर्देश दिया कि ऐसे मामलों में जिम्मेदार सभी लोगों के खिलाफ तत्काल कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

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