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    संभल की जामा मस्जिद में 1974 तक PAC की निगरानी में होता था कीर्तन और नमाज, हवन कुंड होने का भी दावा

    Updated: Sat, 08 Aug 2026 05:00 AM (IST)

    संभल हिंसा की न्यायिक जांच रिपोर्ट में जामा मस्जिद के पूर्व में हरिहर मंदिर होने के दावे सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 1974 तक विवादित स्थल पर पीएस ...और पढ़ें

    संभल में स्थित जामा मस्जिद।

    संभल में स्थित जामा मस्जिद।

    HighLights

    1. न्यायिक रिपोर्ट में जामा मस्जिद के पास हरिहर मंदिर का दावा।

    2. 1974 तक पीएसी निगरानी में नमाज और कीर्तन होते थे।

    3. 1976 तक विवादित स्थल पर हवन कुंड भी मौजूद था।

    सौरव प्रजापति, संभल। संभल हिंसा की जांच के लिए गठित तीन सदस्यीय न्यायिक जांच आयोग के समक्ष भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) के अधिकारियों व अन्य लोगों ने जामा मस्जिद के पूर्व में हरिहर मंदिर होने के बारे में बयान दिए थे। आयोग की 854 पेज (369 पेज हिंदी में अनुवादित व 485 अंग्रेजी में) की रिपोर्ट में स्थानीय लोगों के हवाले से हरिहर मंदिर होने का दावा और साक्ष्य मिलने का उल्लेख किया गया है।

    1978 के दंगे के बाद संभल से पलायन करने वाले सतीश मदान ने आयोग को शपथ पत्र भी दिया था। इसमें मंदिर होने के ऐतिहासिक तथ्यों, दावों और उपलब्ध साक्ष्यों का हवाला दिया गया है।

    बताया कि 1974 तक विवादित स्थल में पीएसी की निगरानी में नमाज पढ़ने के साथ कीर्तन भी होता था। हालांकि, आयोग ने मामला न्यायालय में विचाराधीन होने के कारण विवादित स्थल का मंदिर है या मस्जिद, इस पर कोई निष्कर्ष नहीं लिया है।

    सहायक अधीक्षक पुरातत्वविद् नीति अनिल कुमार ने बताया कि विवादित जामा मस्जिद के निर्माण के दौरान मूल संरचना छिपाई गई है। जामा मस्जिद और संभल का इतिहास (पूर्व में मुरादाबाद) गजेटियर में है। इसके मुताबिक 11वीं शताब्दी में यहां हिंदू राजाओं का शासन था। 1526 में बाबर के आदेश पर विवादित जामा मस्जिद बनाई गई।

    आयोग की रिपोर्ट में 76 वर्षीय सतीश मदान का बयान भी है, जिसमें उन्होंने बताया कि उनकी कीर्तन मंडली में कई सदस्य थे। 1973-74 तक इनके साथ हर सोमवार हरिहर मंदिर में नियमित भजन-कीर्तन करते थे। 1973-74 तक कीर्तन मंडली के लोग पीएसी की निगरानी में मंदिर परिसर में स्थित यज्ञशाला के चारों तरफ बैठकर भजन-कीर्तन करते थे। उस वक्त मुस्लिम समाज भी पीएसी की निगरानी में नमाज पढ़ता था। दोनों संप्रदायों के लोग आ-जा सकते थे। 1976 तक यहां हवन कुंड भी होता था।

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    वर्तमान में उनके अलावा कीर्तन मंडली के अन्य सभी सदस्यों का निधन हो गया है। 1978 में दंगा भड़काने के मुख्य आरोपित मंजर शफी ने उन्हें बेरहमी से पीटा था और मरा समझकर छोड़ गया था। इस बयान के समर्थन में अन्य लोगों ने भी बयान दिए हैं। इससे माना गया कि वर्ष 1976 तक हिंदुओं की विवादित स्थान तक पहुंच थी, जो अब एएसआई के नियंत्रण में है।

    तुर्क बनाम पठान की रार भी हिंसा में बना आधार

    जांच आयोग ने माना कि तत्कालीन एएसपी श्रीश्चंद, सीओ अनुज चौधरी, इंस्पेक्टर अनुज तोमर और उप निरीक्षक दीपक राठी की गवाही के अनुसार, 24 नवंबर 2024 की घटना का एक कारण क्षेत्र में पठानों और तुर्कों का वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश भी थी। पठानों की पैरवी सपा विधायक इकबाल महमूद और तुर्कों की सियासत सांसद जियाउर्रहमान बर्क करते थे।

    एएसपी ने बयान दिया कि वर्तमान सांसद जियाउर्रहमान बर्क की विधायक इकबाल महमूद से राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता थी। दोनों धड़ों में मुस्लिमों का शुभचिंतक और रहनुमा बनने के लिए बढ़ चढ़कर सक्रिय भागीदारी की जाती है।

    हिंसक घटना वाले दिन को भी इसी वजह से वर्तमान सांसद जियाउर्रहमान बर्क एवं विधायक इकबाल महमूद के पुत्र सुहेल इकबाल भी सक्रिय थे। लोगों को भड़काया गया। दोनों वर्गों में झड़प हुई और गोलियां चलीं।

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