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    बुद्ध के शरीर से एक साथ निकली थी आग और जल की धाराएं, चमत्कारों की साक्षी है श्रावस्ती

    Updated: Sat, 01 Aug 2026 08:07 PM (IST)

    श्रावस्ती बुद्ध के चमत्कारों और दिव्य प्रसंगों की साक्षी रही है, जहाँ उन्होंने यमक प्रातिहार्य किया और अपनी माता को धम्म उपदेश देने स्वर्गलोक गए। ...और पढ़ें

    प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए तस्वीर को एआई टूल की मदद से बनाया गया है।

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    HighLights

    1. बुद्ध ने श्रावस्ती में यमक प्रातिहार्य किया।

    2. शरीर से अग्नि-जल धाराएं निकाल आकाश में विचरण।

    3. अंगुलिमाल का हृदय परिवर्तन भी इसी भूमि पर।

    जागरण संवाददाता, इकौना (श्रावस्ती)। श्रावस्ती की धरा उन बौद्ध कालीन दिव्य प्रसंगों की भी साक्षी है, जिन्होंने मानव चेतना को नई दिशा दी।

    बौद्ध ग्रंथों में वर्णित यमक प्रातिहार्य (एक चमत्कार), हिंसा के प्रतीक अंगुलिमाल का करुणा के मार्ग पर अग्रसर होना व माता महामाया को धम्म का उपदेश देने के लिए तावतिंस (त्रायस्त्रिंश) देवलोक गमन और तीन माह बाद संकिसा में पुनः अवतरण की घटनाओं का उल्लेख अनुयायियों में आज भी बहुत श्रद्धा से किया जाता है।

    देखते ही देखते बीज बना विशाल वृक्ष

    बौद्ध ग्रंथों में उल्लेख है कि विरोधियों को जवाब देने के लिए बुद्ध ने श्रावस्ती में यमक प्रतिहार्य किया। आषाढ़ माह में ओड़ाझार में राजा प्रसेनजीत के माली सुमना की ओर से अर्पित आम का रसपान कर उन्होंने बीज जमीन में दबाया और उसी पर हाथ धुलने के लिए पानी डाला। देखते ही देखते बीज विशाल वृक्ष बन गया।

    शरीर से क्रम बदलते हुए एक साथ ऊपर से अग्नि और निचले अंगों से जल की धाराएं प्रकट करते हुए बुद्ध ने आकाश मार्ग पर भ्रमण किया। विविध कलाएं करते हुए वे आकाश मार्ग से स्वर्ग लोक गए। यहां वर्षावास कर अपनी दिवंगत मां को धम्म उपदेश दिया। आश्विन पूर्णिमा को फर्रुखाबाद जिले के संकिसा में पुनः अवतरित हुए।

    बौद्ध अनुयायियों में तावतिंस देवलोक गमन और संकिसा में अवतरण का प्रसंग मातृऋण कृतज्ञता और ज्ञान के सार्वभौमिक प्रसार का प्रतीक माना जाता है। इन दिव्य प्रसंगों के बाद लोग धम्म की ओर आकर्षित हुए।

    इसी धम्म यात्रा में बुद्ध प्रभाव से हिंसा और आतंक का पर्याय बन चुके डाकू अंगुलिमाल का श्रावस्ती में हृदय परिवर्तन की घटना का स्मरण भी बौद्ध अनुयायियों में श्रद्धा से किया जाता है।

    दर्शन में वर्णित घटनाओं को केवल अलौकिक चमत्कार मानना उनके वास्तविक संदेश को सीमित कर देता है। बुद्ध का कथन था कि सबसे बड़ा चमत्कार मनुष्य के भीतर होने वाला नैतिक और आध्यात्मिक रूपांतरण है।

    -भिक्षु देवेंद्र महाथेरो, अध्यक्ष, यंग बोधिसत्व सोसायटी आफ इंडिया, श्रावस्ती।

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