कारगिल युद्ध में कैप्टन याशिका त्यागी की अद्भुत शौर्य गाथा, गर्भवती होने के बावजूद लेह में डटी रहीं
कारगिल युद्ध के दौरान कैप्टन याशिका हटवाल त्यागी ने गर्भवती होने के बावजूद लेह में अपनी सैन्य ड्यूटी निभाई। ...और पढ़ें

कैप्टन याशिका हटवाल त्यागी।
HighLights
गर्भवती होने पर भी कैप्टन याशिका ने नहीं छोड़ा लेह मोर्चा
कारगिल युद्ध में सैनिकों तक पहुंचाई आवश्यक सैन्य सामग्री
राष्ट्रपति मुर्मू ने महिला सशक्तीकरण के लिए किया सम्मानित
जागरण संवाददाता, देहरादून। कारगिल युद्ध की कहानियां अक्सर उन सैनिकों की वीरता से जुड़ी होती हैं, जो दुश्मन से आमने-सामने लड़े।
लेकिन इस युद्ध की एक ऐसी कहानी भी है, जिसमें एक मां ने अपने अजन्मे बच्चे की चिंता के साथ देश की रक्षा का दायित्व भी निभाया।
यह कहानी है भारतीय सेना की पूर्व अधिकारी कैप्टन याशिका हटवाल त्यागी की, जो कारगिल युद्ध के दौरान गर्भवती थीं, लेकिन उन्होंने लेह का मोर्चा छोड़ने से इन्कार कर दिया।
साल 1999। कारगिल की चोटियों पर युद्ध अपने चरम पर था। लेह में तैनात कैप्टन याशिका की पोस्टिंग पूरी होने वाली थी। इसी बीच उन्हें पता चला कि वह मां बनने वाली हैं।
परिवार के लिए यह खुशी का पल था, लेकिन देश के लिए संकट की घड़ी। ऐसे समय में उनके सामने दो रास्ते थे, अपनी और होने वाले बच्चे की सुरक्षा या फिर वर्दी का फर्ज।
उन्होंने दूसरा रास्ता चुना। भारतीय सेना की लाजिस्टिक विंग में तैनात पहली महिला अधिकारियों में शामिल याशिका ने लेह जैसे कठिन इलाके में रहकर सैनिकों तक जरूरी हथियार, राशन और अन्य सैन्य सामग्री पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाई।
वह बताती हैं कि ऊंचाई पर आक्सीजन की कमी, कड़ाके की ठंड और लगातार तनाव के बीच कई बार सांस लेना भी मुश्किल हो जाता था, लेकिन मन में सिर्फ एक ही बात थी, सीमा पर लड़ रहे जवानों तक हर जरूरी सामान समय पर पहुंचना चाहिए।
उनके लिए यह केवल नौकरी नहीं थी, बल्कि राष्ट्रधर्म था। एक ओर उनके भीतर नया जीवन पल रहा था, दूसरी ओर सीमा पर हजारों जवान देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा रहे थे।
मातृत्व और सैनिक धर्म के बीच उन्होंने कोई तुलना नहीं की, बल्कि दोनों जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा से निभाया।
दरअसल, देशभक्ति उन्हें विरासत में मिली थी। उनके पिता भारतीय सेना में थे और 1962, 1965 तथा 1971 के युद्धों में हिस्सा ले चुके थे। जब वह केवल सात वर्ष की थीं, तब पिता का निधन हो गया।
सेना के ट्रक में तिरंगे में लिपटा उनका पार्थिव शरीर देखकर छोटी-सी याशिका के मन में वर्दी के प्रति सम्मान और देशसेवा का संकल्प जन्म ले चुका था।
उस समय महिलाओं के लिए सेना के दरवाजे बंद थे, इसलिए उन्होंने कभी आइपीएस बनने का सपना देखा। लेकिन 1994 में सेना ने महिलाओं के लिए अधिकारी बनने का रास्ता खोला और उन्होंने आफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी, चेन्नई से प्रशिक्षण लेकर अपना सपना पूरा किया।
सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनका मिशन नहीं बदला। आज वह देशभर में युवतियों को सेना में शामिल होने के लिए प्रेरित करती हैं।
महिला सशक्तीकरण और समाज में उनके योगदान के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू उन्हें सम्मानित भी कर चुकी हैं।
कैप्टन याशिका की कहानी बताती है कि साहस केवल बंदूक उठाने का नाम नहीं है। कई बार सबसे बड़ा साहस वह होता है, जब एक मां अपने भीतर पल रहे जीवन की जिम्मेदारी निभाते हुए भी राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटती।
कारगिल विजय दिवस पर उनकी यह कहानी याद दिलाती है कि देश की जीत केवल मोर्चे पर लड़ने वालों से नहीं, बल्कि उन अनदेखे योद्धाओं से भी लिखी जाती है, जो हर परिस्थिति में अपने कर्तव्य पर अडिग रहते हैं।