हरेला पौधरोपण: पिछले साल की गलतियों से सीख, इस बार 5 साल की निगरानी का वादा
पिछले हरेला पर्व पर देहरादून में रोपे गए हजारों पौधे देखभाल के अभाव में सूख गए या उनका निशान तक नहीं बचा। ...और पढ़ें


समय कम है?
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जागरण संवाददाता, देहरादून। हर साल हरेला पर्व पर दून को हरा-भरा बनाने के लिए हजारों पौधे रोपे जाते हैं। बड़े लक्ष्य तय होते हैं और अभियान चलाकर पौधरोपण किया जाता है, लेकिन सवाल यह है कि इनमें से कितने पौधे पेड़ बन पाते हैं।
इस सवाल का जवाब पिछले वर्ष के पौधरोपण स्थलों की मौजूदा स्थिति काफी हद तक देती है। कहीं पौधे सूख चुके हैं तो कहीं उनका निशान तक नहीं बचा। अब एक बार फिर हरेला पर्व पर हजारों पौधे रोपने की तैयारी है। हालांकि, इस बार दावा है कि केवल पौधे रोपे ही नहीं जाएंगे, बल्कि पांच वर्ष तक उनकी देखभाल और तकनीक के माध्यम से निगरानी भी की जाएगी।
पांच वर्ष तक देखभाल
पिछले वर्ष हरेला के अवसर पर नगर निगम ने कारगी ट्रांसफर स्टेशन, पनाश वैली, डांडा लाखौंड और हर्रावाला जोनल कार्यालय समेत शहर के विभिन्न क्षेत्रों में बड़े स्तर पर पौधरोपण किया था। लेकिन, एक वर्ष बाद इन स्थलों की स्थिति अभियान की सफलता पर सवाल खड़े कर रही है।
कई स्थानों पर लगाए गए पौधे अब नजर ही नहीं आते, जबकि कई पौधे सूख चुके हैं। जो पौधे जीवित बचे हैं, उनमें भी अपेक्षित वृद्धि नजर नहीं आ रही है। नगर निगम के अधिकारियों ने भी माना है कि पिछले वर्ष पौधरोपण के बाद पौधों की नियमित देखभाल के लिए कोई समर्पित एजेंसी या कर्मचारी तैनात नहीं किया गया था।
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ऐसे में पानी, सुरक्षा और नियमित रखरखाव के अभाव में बड़ी संख्या में पौधे जीवित नहीं रह सके। यही वजह है कि हर वर्ष होने वाले पौधरोपण अभियानों के बीच अब ‘पौधे कितने लगाए’ के बजाय ‘कितने बचाए’ का सवाल अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।