उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड खत्म, 'एक राष्ट्र-एक शिक्षा' की ओर देवभूमि का 'धामी मॉडल'
उत्तराखंड सरकार ने मदरसा बोर्ड को समाप्त कर अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का गठन किया है। ...और पढ़ें

देश के अन्य राज्यों के लिए नजीर बनेगा धामी सरकार का निर्णय, मुख्यधारा से जुड़ेंगे अल्पसंख्यक समुदायों के नौनिहाल।

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राज्य ब्यूरो, देहरादून । कड़े और राष्ट्रहित के फैसले लेने को मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत होती है। पिछले पांच वर्ष में उत्तराखंड की पुष्कर सिंह धामी सरकार ने इसे बखूबी दर्शाया है और एक के बाद एक ऐतिहासिक निर्णय लिए हैं।
इसी कड़ी में धामी सरकार ने देवभूमि की धरा से एक राष्ट्र-एक शिक्षा की दिशा में कदम बढ़ाते हुए इतिहास रचा है। राज्य में एक जुलाई से उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम-2016 और गैर सरकारी अरबी फारसी मदरसा विनियम-2019 को निरस्त करने के साथ ही उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड को समाप्त कर दिया गया है।
उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड समाप्त
इसकी जगह अब उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम लाया गया है, जिसके तहत उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण गठित किया गया है। इसके तहत न केवल मुस्लिम बल्कि सूबे के सभी छह अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों (मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध व पारसी) के बच्चों को शिक्षा के समान अधिकार और एक जैसी नियामक व्यवस्था के दायरे में लाया गया है।
धामी सरकार का यह कदम केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, तुष्टीकरण की राजनीति पर प्रहार और राष्ट्रवाद की दिशा में युगांतकारी निर्णय है। राज्य के 456 मदरसों को अब अनिवार्य रूप से शिक्षा विभाग और उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा परिषद से संबद्ध होना पड़ेगा।
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इसका सबसे बड़ा प्रभाव यह होगा कि अब मदरसे स्कूल के रूप में चलेंगे और इनमें पढ़ने वाले बच्चों के हाथों में भी गणित, विज्ञान, कंप्यूटर, अंग्रेजी और सामाजिक विज्ञान की पुस्तकें होंगी। सरकार का विजन है कि अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चे डाक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक और प्रशासनिक अधिकारी बनें, न कि केवल धार्मिक कर्मकांडों तक सीमित रहें।
पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार द्वारा बनाए गए मदरसा बोर्ड अधिनियम को निरस्त कर धामी सरकार ने साफ कर दिया है कि अब वोट बैंक की राजनीति के तहत किसी एक वर्ग के लिए समानांतर व्यवस्था नहीं चलेगी। राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखंड का यह कदम देश की आंतरिक सुरक्षा, सामाजिक ताने-बाने और राष्ट्रीय शिक्षा नीति को मजबूत करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।
धामी सरकार का यह निर्णय देश के अन्य राज्यों के लिए भी आंखें खोलने वाला है। जब तक देश का हर नागरिक और हर बच्चा एक जैसी और आधुनिक शिक्षा व्यवस्था से नहीं जुड़ेगा, तब तक विकसित भारत का सपना अधूरा रहेगा।
उत्तराखंड का नया अल्पसंख्यक शिक्षा मॉडल
- पुराना ढर्रा (मदरसा बोर्ड ), नया विजन (अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण)
- केवल एक वर्ग (मुस्लिम) पर ध्यान, - सभी 6 अल्पसंख्यक समुदायों को समानता
- मजहबी व पारंपरिक पाठ्यक्रम, - आधुनिक विषयों की अनिवार्यता
- अनियंत्रित व आजीवन मान्यता, - केवल 3 वर्ष की सशर्त मान्यता
- मुख्यधारा की शिक्षा से दूरी, -शिक्षा विभाग व उत्तराखंड बोर्ड से संबद्धता
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