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    Kargil Vijay Diwas 2026: मां भारती के जांबाज बेटों का प्रण... पिता को कभी देखा नहीं, फिर भी पहन ली वही वर्दी

    Updated: Sun, 26 Jul 2026 08:54 AM (IST)

    उत्तराखंड में कारगिल युद्ध के शहीदों के बेटे अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं, भारतीय सेना में शामिल होकर देश की सेवा कर रहे हैं। ...और पढ़ें

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    जागरण संवाददाता, देहरादून। किसी को विरासत में घर मिलता है, किसी को खेत-खलिहान, लेकिन उत्तराखंड के कई घरों में अगली पीढ़ी को विरासत में मिला है तिरंगे के लिए जीने का जज्बा।

    कारगिल युद्ध में सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीर सैनिकों के बेटे आज उसी वर्दी में देश की सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं, जिसे कभी उनके पिता ने गर्व और सम्मान के साथ पहना था।

    यह शहादत से जन्मा संकल्प है। इन परिवारों में बलिदान की पीड़ा ने हौसला नहीं तोड़ा, बल्कि नई पीढ़ी के भीतर राष्ट्रसेवा का ऐसा जुनून जगाया कि उन्होंने भी वही राह चुनी, जिस पर चलते हुए उनके पिता मातृभूमि के लिए अमर हुए।

    पिता को कभी देखा नहीं, फिर भी पहन ली वही वर्दी

    टिहरी गढ़वाल के डांडा बड़ीयारगढ़ गांव के राइफलमैन बिक्रम सिंह की शहादत की कहानी ऐसी है, जिसने एक बेटे के जीवन का लक्ष्य तय कर दिया। 29 जून 1999 को कारगिल युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए बिक्रम सिंह के जाने के समय उनकी पत्नी बीरा देवी गर्भवती थीं।

    कुछ समय बाद जन्मे बेटे वीर रावत ने पिता को कभी देखा नहीं, लेकिन उनकी वीरता के किस्से हमेशा सुनते रहे। मां की आंखों में पिता के लिए गर्व और गांव वालों की जुबान पर उनकी बहादुरी की कहानियां वीर के मन में सैनिक बनने का सपना जगाती रहीं।

    उन्होंने तय कर लिया कि जिस वर्दी को पहनकर पिता ने देश की रक्षा की, उसी वर्दी में वह भी राष्ट्रसेवा करेंगे। आज वीर रावत भारतीय सेना की 9 गढ़वाल राइफल्स में तैनात हैं।

    मां ने संभाला परिवार, बेटे ने संभाली सरहद

    कारगिल युद्ध में बलिदान हुए लांसनायक हीरा सिंह का परिवार भी ऐसी ही प्रेरणा देता है। 30 मई 1999 को देश के लिए बलिदान देने वाले हीरा सिंह के बाद पत्नी गंगी देवी के सामने तीन बेटों की जिम्मेदारी थी। संघर्षों के बावजूद उन्होंने बच्चों के मन में देशसेवा का भाव बनाए रखा।

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    सबसे छोटे बेटे धीरेंद्र ने सेना में जाने का सपना देखा और उसे पूरा करने के लिए पढ़ाई छोड़ भर्ती में हिस्सा लिया। आज वह कुमाऊं रेजीमेंट में तैनात हैं और पिता की तरह देशसेवा कर रहे हैं।

    हर्रावाला निवासी परिवार की नई पीढ़ी भी सेना में जाने का सपना देख रही है। गंगी देवी के लिए यह उनके पति की बलिदान की सबसे बड़ी सार्थकता है। उनके पोते भी वर्दी पहनेंगे तो यह उनके पति को सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी।

    पिता की वीरगाथा बनी बेटे की प्रेरणा

    सेलाकुई निवासी मयंक थापा की कहानी भी कारगिल की उसी विरासत को आगे बढ़ाती है। उनके पिता नायक कृष्ण बहादुर थापा 11 जुलाई 1999 को बटालिक सेक्टर में बलिदान हुए थे। उस समय मयंक की उम्र महज पांच वर्ष थी।

    पिता की यादें भले कम थीं, लेकिन उनकी वीरता की कहानियां मयंक के मन में गहरी छाप छोड़ती रहीं। बड़े होने पर उन्होंने सेना को ही अपना लक्ष्य बनाया।

    बीबीए की पढ़ाई के दौरान सेना भर्ती में शामिल हुए और पहले ही प्रयास में चयनित हो गए। आज वह भारतीय सेना में सेवाएं दे रहे हैं। उनकी मां मीरा थापा कहती हैं कि बेटे ने पिता की अधूरी जिम्मेदारी को अपना कर्तव्य मान लिया और यही उनके लिए सबसे बड़ा गर्व है।

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