कारगिल युद्ध में उत्तराखंड के 75 वीर सपूतों ने दिया था सर्वोच्च बलिदान, अपने लहू से लिखी विजयगाथा
कारगिल युद्ध में उत्तराखंड के 75 वीर सपूतों ने सर्वोच्च बलिदान दिया, जिनकी वीरता और अदम्य साहस को आज भी गर्व से याद किया जाता है। ...और पढ़ें

देहरादून के गांधी पार्क स्थित शहीद स्मारक।
HighLights
कारगिल युद्ध में उत्तराखंड के 75 जवान हुए शहीद
गढ़वाल, कुमाऊं रेजीमेंट ने दिखाया अदम्य साहस, पराक्रम
उत्तराखंड की सैन्य विरासत भावी पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी
जागरण संवाददाता, देहरादून। कारगिल की दुर्गम चोटियों पर 1999 में मिली जीत केवल सैन्य विजय नहीं थी, बल्कि भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस, अटूट संकल्प और सर्वोच्च बलिदान की ऐसी गाथा थी, जिस पर पूरा देश आज भी गर्व करता है।
इस विजयगाथा में उत्तराखंड के वीर सपूतों का योगदान स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। कारगिल युद्ध में प्रदेश के 75 जवान मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
उन्होंने दुश्मन के कब्जे वाली चोटियों को वापस लेने के अभियान में अपने प्राणों की परवाह किए बिना लड़ाई लड़ी और तिरंगे की शान कायम रखी।
उत्तराखंड को यूं ही वीरभूमि नहीं कहा जाता। यहां सेना की वर्दी सम्मान, परंपरा और राष्ट्रसेवा का प्रतीक मानी जाती है।
सीमांत गांवों से लेकर शहरों तक कई परिवार ऐसे हैं, जिनकी कई पीढ़ियां सेना में देश की सेवा कर चुकी हैं। यही सैन्य परंपरा कारगिल युद्ध में भी दिखाई दी, जब उत्तराखंड के जवान सबसे कठिन मोर्चों पर डटे रहे और दुश्मन के मंसूबों को नाकाम कर दिया।
कारगिल युद्ध में भारतीय सेना के 526 जवानों ने सर्वोच्च बलिदान दिया था। इनमें उत्तराखंड के 75 सैनिक शामिल थे।
गढ़वाल राइफल्स और कुमाऊं रेजीमेंट के जवानों ने द्रास, बटालिक, मशकोह और कारगिल सेक्टर की दुर्गम चोटियों पर अदम्य साहस का परिचय दिया। युद्ध में उत्कृष्ट पराक्रम के लिए प्रदेश के सैनिकों को 39 वीरता पदकों से सम्मानित किया गया।
जब पूरा उत्तराखंड रोया था...
कारगिल युद्ध की सबसे भावुक स्मृतियों में लैंसडौन स्थित गढ़वाल रेजीमेंटल सेंटर का वह दृश्य शामिल है, जब एक साथ नौ बलिदानियों के पार्थिव शरीर वहां पहुंचे थे।
तिरंगे में लिपटे अपने वीर सपूतों को अंतिम विदाई देने हजारों लोग उमड़ पड़े। हर आंख नम थी, लेकिन हर दिल गर्व से भरा हुआ था।
पूरा प्रदेश अपने वीर बेटों को सलाम कर रहा था। कारगिल युद्ध में गढ़वाल राइफल्स के 47 जवान बलिदान हुए, जिनमें 41 उत्तराखंड के थे। जबकि कुमाऊं रेजीमेंट के 16 जवानों ने भी मातृभूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया।
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बलिदान की परंपरा आज भी कायम
उत्तराखंड का सैन्य योगदान केवल कारगिल तक सीमित नहीं है। आजादी के बाद विभिन्न युद्धों और सैन्य अभियानों में प्रदेश के 1,845 सैनिक देश की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दे चुके हैं।
राज्य के सैनिकों को अब तक 1,569 वीरता पदक और 361 विशिष्ट सेवा पदकों से सम्मानित किया जा चुका है। ये उपलब्धियां बताती हैं कि जब भी देश पर संकट आया, उत्तराखंड के रणबांकुरे सबसे आगे खड़े दिखाई दिए।
26 जुलाई को मनाया जाने वाला कारगिल विजय दिवस उत्तराखंड के लिए केवल एक स्मृति दिवस नहीं, बल्कि अपने उन अमर वीरों को श्रद्धांजलि देने का अवसर है, जिन्होंने राष्ट्र की एकता, अखंडता और सम्मान की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया।
उनकी वीरता, त्याग और राष्ट्रभक्ति की यह विरासत आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करती रहेगी।
जिन्होंने लहू से लिखी वीर गाथा
- जिला, बलिदानी
- देहरादून, 25
- पौड़ी, 13
- टिहरी, 12
- नैनीताल, 6
- चमोली, 5
- पिथौरागढ़, 4
- अल्मोड़ा, 3
- रुद्रप्रयाग, 3
- बागेश्वर, 2
- ऊधमसिंह नगर, 2
पदक
- महावीर चक्र: 02
- वीर चक्र: 10
- शौर्य चक्र: 01
- सेना मेडल: 16
- युद्ध सेवा मेडल: 01
- मेंशन-इन-डिस्पैच: 09
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