दिव्यभूमि कैलास में आस्था का संगम
कैलास पर्वत आध्यात्मिकता और रहस्यों का अनूठा केंद्र है, जो सौहार्द्र, शांति और मोक्ष का संदेश देता है। यह हिंदू, बौद्ध, जैन और बोन धर्मों के लिए एक पव ...और पढ़ें
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मनोज झा, राज्य संंपादक दैनिक जागरण उत्तराखंड।

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
जिंदगी की आध्यात्मिकता और रहस्यों का अनूठा केंद्र कैलास बिना किसी वैमनस्य के सौहार्द्र, शांति, मोक्ष और आध्यात्मिक चेतना का संदेश देता है। मान्यताएं इसे पृथ्वी का केंद्रबिंदु, स्वर्ग का द्वार और आनंद की भूमि कहती हैं तो विज्ञानी शोध इसके पिरामिडनुमा आकार, चुंबकीय तरंगों और अलौकिक आकृतियों के कारण इसे और भी रहस्यमयी मानते हैं। समावेशी स्वरूप वाले शिवधाम कैलास की यात्रा करके आए मनोज झा का आलेख....
आध्यात्मिकता, नाम और उनके रहस्य की दृष्टि से तिब्बत के पठारों में स्थित कैलास पर्वत का इस पूरे संसार में संभवतः कोई सानी नहीं है। पौराणिक मान्यताओं में इस स्थान को पृथ्वी और स्वर्ग का सेतु या मिलन बिंदु माना जाता है। कई हिंदू धर्मग्रंथों में अविनाशी शिव के इस निवास स्थल को पृथ्वी का केंद्रबिंदु बताया गया है।
बौद्ध मतावलंबी भी इस स्थल को अक्ष मुंडी यानी पृथ्वी की धुरी मानते हैं। धार्मिक मान्यताओं से इतर वैज्ञानिक खोज और शोध कैलास के रहस्य को और गहरा करते रहे हैं। कई विज्ञानियों का मंतव्य है कि पिरामिडनुमा यह पर्वत मानव निर्मित संरचना है। हालांकि अब तक यह तथ्य अपुष्ट ही है। यदि कभी इसे प्रमाणित किया जा सका तो निश्चित रूप से कैलास पर्वत मानवीय अभियंत्रिकी का सर्वोत्तम उदाहरण भी माना जाएगा।
ट्रांस हिमालय में तिब्बत के पठारों के बीच 6638 मीटर की ऊंचाई पर अनंत काल से अवस्थित अगम्य और मौन कैलास के आसपास की पारिस्थितिकी और वातावरण इसके रहस्य को गहरा करते हैं। वनस्पति और वन्यजीवों से लगभग विहीन पठारी क्षेत्र में स्थित यह पर्वत कई प्रश्नों और जिज्ञासाओं को आमंत्रित करता है। कोई यहां चुंबकीय तरंगों को, तो कोई भारहीनता का अनुभव करता है। कई लोगों को इस स्थान पर आकर निस्सारिता और शून्यता का बोध होने लगता है। सूर्यास्त के समय प्राय: इसके पश्चिमोत्तर हिस्से में उभरने वाली स्वास्तिक और ओम की आकृतियां इसे आलौकिक रहस्य के आवरण में भी लपेटती हैं। और सबसे बड़ी बात तो ये है कि कैलास सिर्फ हिंदू या बौद्ध ही नहीं बल्कि चार-चार आस्थाओं का शास्वत केंद्र है। कैलास का यह समावेशी स्वरूप भी अपने आप में एक रहस्य है।
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हिंदू धर्मग्रंथों में कैलास को शिव का स्थायी निवास स्थल होने के कारण इसे सृजन, आनंद और मोक्ष की भूमि कहा गया है। केलि (आनंद) और आस (निवास) शब्दों की संधि से निर्मित कैलास का शाब्दिक अर्थ भी आनंद की भूमि है। मान्यता है कि शिव अपने पूरे परिवार और गणों के साथ यहां साधक मुद्रा में सदासर्वदा के लिए विराजमान हैं। पुराणों में इसका उल्लेख मानसखंड के रूप में है। इसे गणपर्वत और रजतगिरि के अलावा स्वर्ग का द्वार भी कहा गया है।
हिंदू मान्यताओं से इतर बौद्ध मतानुयायी कैलास और उसके आसपास के क्षेत्र को पौराणिक शंभला नामक कल्पना लोक के रूप में देखते हैं। बौद्धों के लिए भी ज्ञान प्राप्ति का स्थान होने के कारण इसे पवित्र भूमि कहा जाता है। कैलास क्षेत्र को ओल्मोलुनिंग, शांग्री ला, स्वर्ग और इडेन के नाम से भी जाना जाता है। यह दिव्य स्थान जैन पंथ की आस्था का भी केंद्र है।
मान्यता है कि प्रथम जैन तीर्थंकर ऋषभदेव ने कैलास की तलहटी में ही निर्वाण प्राप्त किया था। तिब्बत और हिमालयी क्षेत्रों के प्राचीन बोन धर्म की भी कैलास में गहरी आस्था जुड़ी है। ऐसे में यह जिज्ञासा स्वाभाविक है कि कैलास इतने सारे धर्म, पंथ और आस्थाओं का संगम कैसे है? निश्चित रूप से इनकी जड़ों में कहीं न कहीं अंतरसंबंध और सांस्कृतिक परावर्तन की धुंधली छवियां दिखाई देती हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि इन विभिन्न आस्थाओं की गर्भनाल कहीं एक ही है और समय के साथ इन सभी ने स्वतंत्र अस्तित्व या स्वरूप ग्रहण कर लिया।
धर्मग्रंथ और धारणाएं भले ही अलग-अलग हो गई, लेकिन कैलास अपनी जगह पर मौन और अटल बना रहा। क्या इसे महज संयोग माना जाना चाहिए कि जिस कैलास के पास जाकर एक सनातन धर्मावलंबी अविनाशी शिव से एकाकार होने की चेतना से लैस हो जाता है, उसी कैलास के समक्ष त्रिपटिक के संदेशों के वशीभूत होकर एक बौद्ध अनुयायी बुद्धं शरणम्... की पवित्र भावना से भर जाता है।
हिंदू और बौद्धों की तरह जैन और बोन मतावलंबी भी कैलास दर्शन के पश्चात मोक्ष और परमानंद की अनुभूति प्राप्त करते हैं। प्रश्न है कि यह अनुभूत समानता क्यों और कैसी है? चेतना और आस्था के स्तर पर कैलास इस आध्यात्मिक रहस्य को भी अपने भीतर समाहित किए हुए है। संभवतः भविष्य का कोई समाजशास्त्रीय अध्ययन इस रहस्य का उद्घाटन कर सकता है।
आस्था का वैविध्य भाव
तिब्बत के विशाल पठार के पश्चिमी भाग में स्थित पर्वत श्रृंखला के बीच स्थित कैलास की भव्यता देखते ही बनती है। पर्वत के सामने एक ओर पवित्र मानसरोवर झील तो दूसरी ओर राक्षस ताल का विस्तार है। इन दोनों जलराशियों के मध्य स्थित कैलास को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि हिमशिखर पर विराजमान देवाधिदेव महादेव के दोनों स्कंधों से अविरल नील धाराएं प्रवाहित हो रही है। नीले आसमान में सधन मेघों के विशाल ढेरों के बीच छिपते और झांकते कैलास की छवियां चतुष्कोणीय हैं। कुल 54 किलोमीटर के परिक्रमा मार्ग का आरंभ बिंदु दक्षिणी छोर है।
यहां यमद्वार से परिक्रमा शुरू होती है और दो रात्रिकालीन पड़ावों के बाद तीसरे दिन यह पूरी होती है। यमद्वार से लेकर पूरे परिक्रमा मार्ग में हिंदुओं के अलावा अन्य तीन पंथों की आस्थाओं के कई स्थान चिह्नित हैं। विविध पंथों के तीर्थयात्रियों की भाषा और वेशभूषा का अंतर तो दिखाई दे सकता है, लेकिन पूरे यात्रा मार्ग में आस्था का यह वैविध्य तिरोहित होता दिखाई देगा। समस्त मोक्षकामी एक ही मार्ग, एक ही विग्रह, एक ही प्रतीक, एक ही श्वेत पिरामिड, एक ही पर्वत, एक ही कैलास के दर्शन के अहोभाव में डूबे नजर आते हैं। अहोभाव और परमानंद की इसी साम्यावस्था के बीच हिंदुओं को शिव, बौद्धों को तथागत तो जैनियों को तीर्थंकर के दिव्य दर्शन होते हैं।
सहचर्यं में समाधान
विश्व में कई ऐसे स्थान हैं, जो विभिन्न धर्मों और आस्थाओं का केंद्र हैं। प्रसिद्ध यरुशलम का ही उदाहरण लें तो वहां से यहूदी, ईसाई और इस्लाम तीनों धर्मों की आस्थाएं जुड़ी हैं। हालांकि वहां तीनों के उपासना स्थल अलग-अलग हैं। इनमें परस्पर पार्थक्य है, मनोमालिन्य है, वैमनस्य और दावेदारियां भी हैं। सदियां बीत गई, लेकिन धार्मिक सौहार्द्र और समन्वय के लिए यरूशलम की तड़प आज भी अंतहीन दिखाई देती है। यरुशलम या इस तरह के अन्य विवादित धर्मस्थलों के दावेदार कैलास के आध्यात्मिक सहचर्य में समाधान तलाश सकते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में कैलास पर दृष्टिपात करें तो वहां समन्वय, सौहार्द्र, संसृति और सृष्टिकामी चेतना का अद्भुत संगम दिखाई देता है। यहां शिव, बौद्ध, तीर्थकर आदिक सभी एकाकार हो गए हैं।
आप शुभ्र कैलास की तलहटी में खड़े होकर या फिर उसे तनिक दूर से निहारें, आपके अंदर तिरोभाव की जागृति अनायास आरंभ होने लगती है। वैर-द्वेष का भाव विगलित होने लगता है, स्वार्थ पार्श्व में जाने लगता है, जबकि परमार्थं का भाव अग्रसर होने लगता है। कैलास दर्शन के दौरान मन मगन होने लगता है, मोक्ष की कामना उद्भासित होने लगती है और संसार निस्सार प्रतीत होने लगता है। विस्मयकारी तो यह है कि धर्म चाहे कोई भी हो, कैलास का प्रत्येक तीर्थयात्री इन्हीं मनोदशाओं के वशीभूत हो जाता है। धर्म और पंथ को लेकर वर्तमान के युद्धरत विश्व में अनुभूति का यह समाजवाद एक महान आश्चर्य सदृश्य है।
कैलास के प्रत्यक्ष दर्शन के लिए आपको चीन के स्वायत क्षेत्र तिब्बत तक की लंबी और दुरुह यात्रा करनी होती है, लेकिन जहां तक कैलासानुभूति का प्रश्न है तो इसके लिए आपको शिव और बुद्ध जैसा समदर्शीं, समावेशी और सामासिक होने की आवश्यकता है। मौन कैलास और उस पर विराजमान मृत्युंजय महादेव हमें यही सीख भी देते हैं।



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