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    कांवड़ यात्रा 2026 इस बार 30 जुलाई से होगी शुरू, 11 अगस्त को मनाया जाएगा शिवरात्रि का पर्व

    Updated: Sat, 18 Jul 2026 07:36 PM (IST)

    इस वर्ष कांवड़ यात्रा 30 जुलाई से 11 अगस्त तक चलेगी, जिसमें शिवरात्रि का पावन पर्व 11 अगस्त को मनाया जाएगा। ...और पढ़ें

    सांकेतिक तस्वीर।

    सांकेतिक तस्वीर।

    HighLights

    1. कांवड़ यात्रा 30 जुलाई से 11 अगस्त तक चलेगी

    2. शिवरात्रि का पावन पर्व 11 अगस्त को मनाया जाएगा

    3. श्रावण मास में महादेव की पूजा का विशेष महत्व है

    जागरण संवाददाता, रुड़की। सनातन परंपरा में श्रावण केवल एक माह नहीं, बल्कि संपूर्ण चराचर सृष्टि की चेतना के नवीनीकरण का उत्सव है।

    इस वर्ष कांवड़ यात्रा 30 जुलाई से प्रारंभ होकर 11 अगस्त तक चलेगी, जबकि शिवरात्रि का पावन पर्व 11 अगस्त को मनाया जाएगा।

    उत्तराखंड ज्योतिष परिषद के अध्यक्ष ज्योतिषाचार्य रमेश सेमवाल ने बताया कि चंद्र श्रावण मास 30 जुलाई से प्रारंभ हो रहा है।

    सावन का पावन मास आत्मा को परमात्मा से जोड़ने, अंतर्मन को शुद्ध करने और महादेव की असीम अनुकंपा प्राप्त करने का सबसे चैतन्य काल माना जाता है।

    सावन के सोमवार के दिन भगवान शंकर और माता पार्वती की संयुक्त पूजा-अर्चना भक्तों के जीवन के सभी कष्टों को दूर कर उन्हें सुख-समृद्धि प्रदान करती है।

    ज्योतिषाचार्य रमेश सेमवाल ने बताया कि सर्वप्रथम भगवान परशुराम ने कांवड़ यात्रा की थी।

    उन्होंने इसके पीछे के पौराणिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि जब विषपान के कारण भगवान शंकर के शरीर में अत्यंत गर्मी उत्पन्न हो गई थी, तब उनकी इस तपन और व्याकुलता को शांत करने के लिए सभी देवताओं ने उन पर शीतल गंगाजल अर्पित किया था।

    यही कारण है कि श्रावण मास में महादेव को शीतलता प्रदान करने के लिए उन पर निरंतर जल, गंगाजल या दूध चढ़ाने की पावन परंपरा सदियों से चली आ रही है।

    शिव कृपा प्राप्ति के सरल मार्ग

    ज्योतिषाचार्य सेमवाल ने बताया कि श्रावण मास में प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन में सकारात्मक ऊर्जा के संचार के लिए साधना करनी चाहिए।

    प्रतिदिन ओम नमः शिवाय अथवा महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से शरीर के पंचतत्व संतुलित होते हैं और मानसिक अशांति का नाश होता है। सावन मास में मिट्टी से निर्मित शिवलिंग (पार्थिव शिवलिंग) की पूजा का विशेष महत्व है।

    पूजा के बाद इनका विसर्जन यह बोध कराता है कि हमारा यह नश्वर शरीर भी अंततः मिट्टी में ही विलीन हो जाएगा। यह विशेष पूजा मनुष्य को अहंकार से मुक्त कर अत्यंत विनम्र बनाती है।

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