पति के छोड़ जाने के बाद राजबाला ने नहीं हारी हिम्मत, खरीदा ई-रिक्शा; बेटी को पाला और पढ़ाया
पति के छोड़ जाने के बाद राजबाला ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने अपनी बेटी को पाला और पढ़ाया। आर्थिक तंगी से जूझते हुए उन्होंने ई-रिक्शा खरीदा और अब रुद् ...और पढ़ें

पति के साथ छोड़ने के बाद भी नहीं टूटी राजबाला की हिम्मत।

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
जागरण संवाददाता, रुद्रपुर। सुबह की हल्की धूप के साथ जब रुद्रपुर की सड़कों पर एक ई-रिक्शा धीरे-धीरे आगे बढ़ता है, तो उसके पहियों के साथ एक महिला की जिद, मेहनत और आत्मसम्मान की कहानी भी चल पड़ती है।
यह कहानी है शिवनगर क्षेत्र में रहने वाली राजबाला की, जिन्होंने जिंदगी की कठिन राहों से हार मानने के बजाय उन्हें अपनी ताकत बना लिया। पति का सहारा छूटने के बाद ई-रिक्शा चलाकर उन्होंने अपनी आर्थिकी को तो संभाला ही बल्कि अपने बच्चों के साथ बूढ़े मां-बाबा का सहारा भी बनी हुई हैं।
राजबाला की जिंदगी का संघर्ष कोई नया नहीं है। वर्ष 2011 में उनके पति ने उनका साथ छोड़ दिया। उस समय उनकी बेटी छोटी थी और घर में कमाने वाला कोई नहीं था। अचानक आई इस जिम्मेदारी ने उन्हें झकझोर तो दिया, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। राजबाला ने तय कर लिया कि चाहे हालात कितने भी कठिन क्यों न हों, वे अपनी बेटी का भविष्य अंधेरे में नहीं जाने देंगी।
उन्होंने अकेले ही अपनी बेटी को पाला-पोसा, पढ़ाया-लिखाया और समय आने पर उसकी शादी भी की। इस पूरे सफर में आर्थिक तंगी हमेशा उनके साथ रही। घर चलाने के लिए उन्होंने रुद्रपुर स्थित गुडवियर की एक कंपनी में करीब सात साल तक नौकरी की। रोजाना मेहनत के बावजूद आय इतनी नहीं थी कि परिवार की हालत सुधर सके।
टुक-टुक परिवार की रोजी-रोटी का जरिया
तभी उन्होंने एक बड़ा फैसला लिया। राजबाला ने अपनी जमा पूंजी और पीएफ का पैसा निकालकर एक टुक-टुक यानी ई-रिक्शा खरीद लिया। शुरुआत में लोगों की हैरानी भरी नजरें और ताने भी सुनने पड़े। सड़कों पर ई-रिक्शा चलाती महिला लोगों के लिए एक अलग ही दृश्य था, लेकिन राजबाला के लिए यह सम्मान और आत्मनिर्भरता की राह थी।
धीरे-धीरे उन्होंने इस काम में खुद को ढाल लिया। आज वे रुद्रपुर से काशीपुर, दिनेशपुर, किच्छा और गदरपुर तक ट्रांसपोर्टरों का सामान पहुंचाने का काम करती हैं। सुबह से शाम तक सड़कों पर दौड़ता उनका टुक-टुक उनके परिवार की रोजी-रोटी का जरिया बन चुका है।
राजबाला बताती हैं कि आज उनके साथ उनके मां और बाबा रहते हैं। उनकी देखभाल और खर्च की जिम्मेदारी भी वही उठाती हैं। दिनभर की मेहनत के बाद जब वे घर लौटती हैं, तो थकान जरूर होती है, लेकिन इस बात का सुकून भी होता है कि उनके कारण घर का चूल्हा जल रहा है।
राजबाला की कहानी यह साबित करती है कि हालात चाहे कितने भी मुश्किल क्यों न हों, अगर इंसान के हौसले मजबूत हों तो वह अपनी जिंदगी की दिशा खुद तय कर सकता है। आज उनका टुक-टुक सिर्फ एक वाहन नहीं, बल्कि संघर्ष, आत्मसम्मान और उम्मीद की चलती-फिरती मिसाल बन चुका है।
रोज की मेहनत से चल रहा घर का खर्च
राजबाला बताती हैं कि ई-रिक्शा चलाकर वे रोजाना करीब 300 से 400 रुपये तक कमा लेती हैं। इसी कमाई से घर का खर्च चलता है और मां-बाबा की जरूरतें भी पूरी होती हैं। उनका कहना है कि मेहनत भले ही ज्यादा करनी पड़ती है, लेकिन अपने दम पर परिवार का सहारा बनने का सुकून सबसे बड़ा होता है।
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